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आज ही के दिन महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने बसाया था जयपुर को - यह है जयपुर की खास जगह

आज ही के दिन  महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने बसाया था जयपुर को

18 नवम्बर 2017
जयपुर - पर्यटन एवं मेहमान नवाजी के लिए राजस्थान की राजधानी और गुलाबी नगर के नाम से विश्व में मशहूर सबसे बडा नगर जयपुर सैलानियों की खास पसन्द है। यह पहला ऐसा प्राचीन नियोजित शहर है जहां चौडी सडकें, चौपड, प्राचीन ऊँचे-ऊँचे कलात्मक गुलाबी द्वार, महल, किले, राजाओं की छतरियां, मंदिर एवं बाग-बगीचे आदि अपने समय के वैभव की कहानी सुनाते हैं। जयपुर शहर को महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने १७२७ ई. में बसाया था और इस नगर का निर्माण एक बंगाली वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य ने किया था। देशी एवं विदेशी सैलानी बडी संख्या में पूरे वर्ष जयपुर में चहल-कदमी करते हुए नजर आते हैं। जयपुर को बसे हुए २९० वर्श पूरे हो चूके हैं। जयपुर पर्यटन की दृश्टि से किसी इन्द्रधनुश से कम नहीं हैं।
सटी पैलेस- पुराने शहर के हृदय स्थल में राजस्थानी एवं मुगल शैली में निर्मित शासकों का महल जिसे "सिटी पैलेस" कहा जाता है स्थित है। यहां संगमरमर के स्तम्भों पर नक्काशीदार मेहराब, सोने व रंगीन पत्थरों की फूलों वाली आकृतियों के अलंकृन दर्शक को अचम्भित कर देते हैं। प्रवेश द्वार पर दो नक्काशीदार हाथी पहरेदार के रूप में खडे नजर आते हैं। सिटी पैलेस में एक दर्शनीय संग्रहालय बनाया गया है। जहां राजस्थानी पोशाकों तथा मुगलों व राजपूतों के अस्त्र-शस्त्रों का बेहतरीन संग्रह किया गया है। विभिन्न रंगों व आकार वाली तराशी गई मूठ वाली तलवारें जिनमें मीनाकारी का जडाऊ कार्य एवं जवाहरतों से अलंकृत हैं। संग्रहालय में शाही कालीनों, साज-सामान, लघु चित्र, अरबी, फारसी, लेटिन व संस्कृत में दुर्लभ ज्योतिश एवं खगोल विज्ञान की रचनाओं के उत्कृष्ट संग्रह देखने को मिलते हैं। सीटी पैलेसे खुलने का समय प्रातः ९ बजे से सायं ५ बजे तक है। प्रवेश के लिए निर्धारित शुल्क देना पडता है।
जंतर-मंतर- सिटी पैलेस के समीप ही स्थित "जंतर-मंतर" एक पत्थरों से बनाई गई खूबसूरत वेदशाला है। सवाई जयसिंह द्वारा देश में पाँच स्थानों पर बनाई गई वेदशालाओं में जयपुर की वेदशाला सबसे बडी और आकर्शक है। जंतर-मंतर के सभी यंत्रों का आकार और विन्यास वैज्ञानिक आधार पर किया गया है। सबसे बडा यंत्र है सूर्य घडी एवं प्रभावशाली यंत्र है राम यंत्र। सूर्य घडी से समय मालूम किया जाता है कि जबकि राम यंत्र ऊँचाई नापने के लिए बना है। यहां तारों की गणना करने वाले कई यंत्र तथा बारह राशियों के यंत्र देखते ही बनते हैं। जंतर-मंतर खुलने का समय प्रातः ९ बजे से सायं ४.३० बजे तक है।
हवामहल - शीतल हवा के लिए बनवाया गया हवामहल जंतर-मंतर के पीछे की ओर बडी चौपड के समीप मुख्य मार्ग पर स्थित है। हवामहल जाने का रास्ता पीछे की ओर बना है। इसका निर्माण १७९९ ई. में करवाया गया था। पाँच मंजिला हवामहल अपने अनेक खिडकियों एवं झरोखों के साथ अद्भुत कारीगरी के लिए गुलाबी रंग में अपनी पहचान बनाता है। बताया जाता है कि इन झरोखों से रानियां सडक पर निकलने वाले जुलूस एवं शोभा यात्राओं को देखा करती थी। यहां एक संग्रहालय भी स्थित है। हवामहल प्रातः ९ बजे से सायं ४.३० बजे तक दर्शकों के लिए खुला रहता है।
गोविन्द देव जी मंदिर - सिटी पैलेस से जुडा जय निवास गार्डन के मध्य स्थित गोविन्द देव जी का मंदिर धार्मिक आस्था का बडा केन्द्र है। मंदिर भगवान कृश्ण को समर्पित है। जय निवास उद्यान के उत्तर में चन्द्र महल तथा दक्षिण में तालकटोरा तालाब स्थित है। मंदिर एवं ताल कटोरा के मध्य कई मंदिर, सरोवर, उद्यान आदि बनाये गये है। तालकटोरा में दर्शक नौकायन का आनन्द भी ले सकते हैं। बताया जाता है कि कृश्ण की मूर्ति को सवाई जय सिंह द्वितीय वृन्दावन से लाये थे और उस समय चन्द्र महल में ही पधराया गया तथा आगे चलकर वर्तमान स्थान पर स्थापित की गई। मंदिर के गर्भगृह में विशाल चाँदी के पाट पर श्याम वर्ण गोविन्द, राधा उनकी सखियों और लड्डू गोपाल की प्रतिमाएं है। जेश्ठ माह मं् भगवान की जलविहार, नोकाविहार, फूल बंगला और फूल श्रृंगार झांकियां सजाई जाती है। मंदिर की आन्तरिक सज्जा देखते ही बनती है, जहां यूरोपियन शैली के झूमर लगे है और भारतीय कला व संस्कृति को दर्शाने वाले चित्र लगाये गये है। मंदिर की छत चमकदार सोने की जडाई से बनी है। यह ऐसी जगह पर है जिसके चन्द्र महल से सीधे दर्शन किये जा सकते है। मंदिर में कृश्ण जन्माश्टमी, होली एवं वैश्णव पर्व धूम-धाम से मनाये जाते हैं, जिसमें विदेशी सैलानी भी बडी संख्या में भाग लेते है।
सरगासूली - सरगासूली अथवा ईसर-लाट त्रिपोलिया बाजार के पश्चिम की ओर आसमान को छूती हुई इमारत है। इसका निर्माण सवाई ईश्वरी सिंह ने १७४९ ई. में करवाया था। यह लाट विजय प्राप्ति को मनाने के लिए बनवाई गई थी। त्रिपोलिया बाजार से गुजरते समय यह दूर से ही नजर आती है।
रामनिवास बाग - यह उद्यान अलबर्ट संग्रहालय, चिडयाघर, वनस्पति संग्रहालय, रवीन्द्र मंच, आधुनिक कला दीर्घा तथा ओपन थियेटर तथा खूबसूरत बगीचे अपने में समेटे हुए है। अलबर्ट संग्रहालय भारतीय वास्तु कलाशैली का एक सुन्दर नमूना है जिसका निर्माण सवाई जयसिंह द्वितीय ने १८६८ ई. में करवाया था। यहां उत्कृष्ट मूतियां, चित्र, प्राकृतिक विज्ञान के नमूने, इजिप्ट की ममी, फारस के कालीन, दीवारों पर बने बडे-बडे प्राचीन चित्र, अस्त्र-शस्त्र तथा विभिन्न प्रकार की मनोरम झांकियां देखी जा सकती है। चिडयाघर अत्यन्त समृद्ध है जहां वनमानुश चिमपांजी की अठखेलियां विशेश रूप से लुभाती हैं। रवीन्द्र मंच सांस्कृतिक गतिविधियों तथा कलादीर्घा चित्रकारों को बडावा देने का माध्यम है। यहां के सुन्दर बाग-बगीचे हर समय विशेश कर प्रातः एवं सायं दर्शकों की चहल-पहल से आबाद रहते हैं।
गुडया संग्रहालय - पुलिस स्मारक के समीप स्थित छोटी गुडयाओं का संग्रहालय विशेश रूप से दर्शनीय है। यह संग्रहालय मूक एवं बंधिर विद्यालय परिसर में बनाया गया है। यहां विभिन्न देशों की छोटी-छोटी विभिन्न प्रकार की रंग-बिरंगी गुडयाएं देखने को मिलती हैं। यह संग्रहालय प्रातः ८ बजे से सायं ६ बजे तक दर्शकों के लिए खुला रहता है।
तारामण्डल - सचिवालय के समीप निर्मित आधुनिक बी.एम.बिडला तारामण्डल खगोल विज्ञान की जानकारी प्राप्त करने का एक अच्छा माध्यम है। कम्प्यूटर युक्त प्रक्षेपण व्यवस्था के साथ यहां श्रव्य एवं दृश्य कार्यक्रम के माध्यम से शिक्षा व मनोरंजन साधनों की अच्छी व्यवस्था उपलब्ध है। विद्यार्थियों को विद्यालय की ओर से समूह में आने पर रियायत प्रदान की जाती है। प्रत्येक माह के अन्तिम बुधवार को यह बंद रहता है। भवन की कलात्मकता एवं आस-पास के उद्यान की सुन्दरता देखते ही बनती है।
मोती डूंगरी एवं बिडला मंदिर - जवाहर लाल नेहरू मार्ग पर स्थित मोती डूंगरी का प्राचीन गणेश मंदिर तथा इसके समीप ही बिडला समूह द्वारा पिछले वर्शों में निर्मित आधुनिक बिडला मंदिर जिसे लक्ष्मी नारायण मंदिर भी कहा जाता है दर्शनीय हैं। गणेश मंदिर के बाहर कुछ ओर मंदिर भी बने हैं। बुधवार के दिन यहां विशेश रूप से दर्शनार्थियों का ताता लगा रहता है। यहां गणेश जी की दिव्य प्रतिमा में सूंड दांई ओर है जिस पर सिंदूर का चौला चढाकर श्रृंगार किया जाता है। गणेश जी के मस्तश्क पर चांदी का मुकुट और छत्र लगा है। बिडला मंदिर सफेद संगमरमर से निर्मित अत्यन्त कलात्मक मंदिर है। यह मंदिर एक आकर्शक उद्यान के बीच स्थित है। गर्भगृह में विश्णु एवं लक्ष्मी जी की विशालकाय प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर के तोरण द्वार व मूर्तिकला का सौन्दर्य अद्भुत है। बिना स्तम्भों का ४ हजार वर्ग फीट का सभा मण्डप एवं दीवारों पर बेल्जियम काँच में उत्कीर्ण धार्मिक चित्रों की शोभा देखते ही बनती है। उद्यान परिसर में कुछ अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी लगी है। रात्री में बिजली की रोशनी में नहाया पूरा परिसर अत्यन्त रमणीक प्रतीत होता हैं। दक्षिण भारत भवन निर्माण शैली में बना यह मंदिर ५५ हजार वर्ग फीट क्षेत्रफल में निर्मित है। गलताजी - शहर की पूर्वी पहाडयों के मध्य स्थित गलताजी का धार्मिक एवं प्राकृतिक परिवेश देखते ही बनता है। यहां पहुँचने के लिए पहाडी पर दो कि.मी. की चढाई तय करनी होती है। दूसरा रास्ता आगरा रोड से जाम डोली होकर जाता हैं। यह स्थल जयपुर से करीब १५ कि.मी. दूर आज विश्व के मानचित्र पर अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहां के मंदिरों में दक्षिणी मुखी हनुमान जी, संतोशी माता मंदिर, राम रामेश्वर मंदिर, कल्याण जी मंदिर, पंचमुखी हनुमान जी मंदिर, सिद्धी विनायक मंदिर, वीर हनुमान मंदिर, पापडा मंदिर तथा पहाडी की चोटी पर सूर्य मंदिर प्रमुख मंदिर है। यहां )शि गालव मंदिर एवं पवित्र कुण्ड बन है। महिला एवं पुरूशों के स्नान के लिए अलग-अलग कुण्ड बनाये गये है। यहां बने सात कुण्डों में सूर्य कुण्ड एवं गोपाल कुण्ड प्रमुख है। बताया जाता है कि अठारवीं सदी में जयपुर के महाराजा सवाई सिंह द्वितीय के दीवान कृपा राम ने यहां हवेलीनुमा भव्य मंदिर तथा कुण्डों का निर्माण कराया था। सावन एवं कार्तिक मास में यहां स्नान कर दान पुण्य करना पवित्र कार्य माना जाता है। इस तीर्थ पर बडी संख्या में बन्दरों की अठखेलियां देखते ही बनती है।
गढ गणेश मंदिर - जयपुर में नहार गढ की पहाडी के समीप चोटी पर स्थित गढ गणेश के मंदिर में गणेश जी बाल रूप में विराजित है। यह स्थल जयपुर के लोकप्रिय पर्यटक स्थलों में है। मंदिर का निर्माण सवाई जयसिंह द्वारा अश्वमेध यज्ञ के साथ करवाया गया था। यहां रिद्धि-सिद्धि और उनके दो पुत्र शुभ-लाभ की मूर्तियां भी स्थित है। बुधवार के दिन यहां विशेश रौनक रहती है। मंदिर का रास्ता ब्रह्मपुरी के समीप से पहाडी पर जाता है।
चूलगिरी जैन मंदिर - घाट की गूणी के पास जयपुर-आगरा राश्ट्रीय राजमार्ग ११ पर ऊँची पहाडी पर स्थित चूलगिरी जैन मंदिर भगवान महावीर स्वामी को समर्पित है, जहां महावीर स्वामी की बहुमूल्य रत्नों से जडत ७.५ फीट ऊँची खडगासन मुद्रा की प्रतिमा स्थापित है साथ ही नेमिनाथ एवं महावीर स्वामी की छोटी प्रतिमाएं भी मूल नायक के समीप वेदियों में स्थापित हैं, जो पदमासन मुद्रा में है। परिसर में चौबिसी एवं एक कक्ष में देवी पदमावति की प्रतिमा भी स्थापित है। मंदिर पहुँचने के लिए सडक मार्ग एवं पहाडी मार्ग बने है। मंदिर के भव्य द्वार की कारीगरी लुभावनी है। जैन धर्मावलम्बियों का यह एक महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल है। आमेर -जयपुर के समीप ही राजा मानसिंह, मिर्जा राजा जय सिंह एवं सवाई जय सिंह द्वारा बनाया गया आमेर का महल अपनी अद्भुत वास्तुकला एवं दीवारों पर बनाई गई कलाकारी के लिए व्याख्यात हैं। महलों के साथ-साथ यहां बने उद्यान और मंदिर इसकी शोभा को बढाते हैं। महल की तलहटी में स्थित मावटा झील के मध्य स्थित मोहन बाडी अथवा केसर क्यारी तथा पूर्वी किनारे पर दिलराम बाग महल की बाहरी सुन्दरता में चार चाँद लगाते हैं। महल में बने दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, दो मंजिला चित्रित गणेश पोल प्रवेश द्वार, प्रवेश द्वार के पीछे बांई ओर जस मंदिर तथा दांई ओर सुख निवास महल बने हैं। महल राजपुत एवं मुगल कला शैली के सम्मिश्रण से बनाये गये है, जिनकी नक्काशीदार जाली, बारिक शीशों का कार्य, चित्रित एवं नक्काशीदार अलंकरण देखते ही बनते हैं। महल के पहले मंजिल पर बने महल भी आकर्शक है। महल से पूर्व जलेब चौक में बना शीतला माता का मंदिर दर्शनीय है।
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