प्रदेश में विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही राज्य कर्मचारी अपनी मांगों को मनवाने के लिए जुट गए है और भाजपा सरकार पर लगातार दबाव बनाने लगे है, वहीें सरकार भी वोटबैंक के चक्कर में इन कर्मचारियों को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा रही है और वार्ता का लॉलीपाप बराबर दे रही है, इसके बावजूद कर्मचारी संगठन मान रहे है कि वार्ता में सिर्फ मीठी गोलियां दी जा रही है, कोई हल नहीं निकल रहा है। इसीलिए अखिल राजस्थान राज्य कर्मचारी संयुक्त महासंघ (एकीकृत) ने तो राज्य सरकार पर आरोप भी जड दिया है कि सरकार उन्हें गंभीरता से नहीं ले रही है और उनके वादे पूरे नहीं किए जा रहे है।
कर्मचारी महासंघ (एकीकृत ) के प्रदेशाध्यक्ष गजेन्द्र सिंह राठौड़ ने शनिवार को राज्य केंद्रीय मुद्रणालय जयपुर में महासंघ (एकीकृत) की महासमिति की बैठक ली और कर्मचारियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और मुख्य सचिव डीबी गुप्ता ने जब सभी संबंधित विभागों के मंत्रियों और प्रमुख सचिवों को निर्देश जारी कर दिए थे कि वे अपने-अपने विभागों के कर्मचारी संगठनों से 28 मई तक वार्ताएं आयोजित कर उन्हें जानकारी दें इसके बावजूद कई मंत्रियों और शासन सचिवों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और इसी का नतीजा है कि अधिकांश मंत्रियों ने वार्ता के नाम पर कई कर्मचारी संगठनों को एक साथ बुलवा लिया और उनसे वार्ता कर खानापूर्ति कर तो कुछ मंत्रियों ने तो संगठनों से वार्ता तक नहीं की है। राठौड़ ने कहा कि मंत्री मंडलीय उप समिति की संगठनों के साथ वार्ता भी एक दिखावा है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने सुराज संकल्प पत्र 2013 में कर्मचारी कल्याण के लिए जो 14 घोषणाएं की थीं। उनमें से अधिकांश घोषणाएं आज भी अधूरी हैं । वेतन विसंगतियों को दूर करने के लिए गठित डी सी सामंत समिति के कार्यकाल को भी सरकार अपना समय निकालने के हिसाब से बढ़ाती जा रही है। वहीं मंत्री मंडलीय उप समिति कर्मचारी संगठनों की मांगों पर ठंडे छींठे देने का काम कर रही है। महासंघ (एकीकृत) के महामंत्री राजेंद्र शर्मा ने बताया कि राज्य सरकार की कर्मचारी विरोधी नीतियों को लेकर बैठक में रोष व्यक्त किया गया। बैठक में वेतन विसंगति निवारण समिति एवं मत्री मंडलीय उप समिति के साथ कर्मचारी संगठनों की वार्ताओं की समीक्षा भी की गई।





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