चूरू.
जिले में एक गांव ऐसा है जहां एक भी मुस्लिम नहीं है, मगर यहां स्थित पीर की दरगाह में हिन्द आज भी पूरी शिद्दत से इबादत करते हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं अंचल की गंगा-जमुनी तहजीब को सहेज रहे गांव घंटेल की। जिला मुख्यालय के पंखा सर्किल से करीब छह किमी दूर स्थित इस गांव के लोगों में पीर के प्रति मुस्लिमजनों के समान ही आस्था है। हर शुक्रवार को यहां लगने वाले छोटे मेले में हिन्दू-मुस्लिमजन आकर मन्नत मांगते हैं। दरगाह की देखरेख करने वाले गांव के ही संतलाल महाब्राह्मण बताते हैं कि करीब ७० फीट से अधिक ऊंचे टीले पर स्थित इस दरगाह के नीचे करीब १५०० वर्ष पहले सड़क के बराबर पीर की मजार थी। कालांतर में पुरानी मजार नीचे दबती चली गई। इस पर समय के साथ एक के ऊपर एक मजारें बनती चली गई। गांव के ही लोग आपस में राशि एकत्रित कर दरगाह की चारदीवारी व अन्य निर्माण कार्य करवा रहे हैं।
खोदते हैं मिट्टी
लोगों की मान्यता है कि आज भी किसी घर में आग लगती है तो पीर की कृपा दृष्टि से आग कभी दूसरे घर में नहीं फैलती है। गांव में जिस साल बारिश नहीं होती है तो गांव के लोग दरगाह के पास हाथ से मिट्टी खोदते हैं। तो कुछ ही दिनों में बारिश हो जाती है।
पीर के बारे में मान्यता है
गांव वालों को पीर का नाम तो नहीं पता। मगर यहां के बुजुर्ग बताते हैं कि एक हजार से अधिक वर्ष पहले हुए किसी युद्ध के दौरान पांच योद्धा लड़ते हुए जोधपुर से रवाना हुए। यहां आकर एक योद्धा युद्ध में काम आ गए। जिनकी ये मजार दरगाह के रूप में आज यहां स्थापित है। एक पीर की मजार आज झुंझुनूं जिले के नरहड़ में है। घंटले के पीर नरहड़ के पीर के बड़े भाई थे।
इसलिए यहां के पीरे में मान्यता रखने वाले जब नरहड़ जाते हैं तो वहां के लोग कहते हैं कि 'थे अठै आवो ही क्यूं हो। अठै सै बड़ा पीर तो थारै कन्नै बैठï्या है।
विकास की डगर पर है गांव
करीब १७०० घरों की आबादी के इस गांव की जनसंख्या करीब पांच हजार से अधिक है। यहां सड़क, बिजली, पानी, पानी निकासी, मोबाइल, चिकित्सा व शिक्षा की सुविधाएं मौजूद हैं। गांव के ओमप्रकाश ने बताया कि गांव में इन वर्षों में अच्छा विकास हुआ है। बिजली आपूर्ति भी सही है। कुछ एक सड़कें हैं जो बननी शेष हैं।
चूरू से पहले आई गांव में बिजली
गांव के लोग बताते हैं कि गांव के सबल सिंह बीकानेर रियासत के राजा गांगासिंह के बड़े अफसर थे। उनके पुत्र पृथ्वीसिंह राठौड़ तात्कालीन राजस्थान राज्य विद्युत मंडल में चीफ इंजीनियर थे। उन्होंने चूरू से पहले अपने गांव में बिजली की आपूर्ति शुरू करवाई। गांव का पहला बिजली कनेक्शन यहां छत्तू सिंह की आटा चक्की में हुआ था।
घटने का नाम घंटेल
गांव के नामकरण के बारे में लोगों की मान्यता है कि करीब १७०० वर्ष पहले यहां मोयल चौहान आकर बसे थे। उस समय यहां सात बास (मोहल्ले) होते थे। किसी प्राकृतिक आपदा के कारण तीन मोहल्ले खत्म हो गए और चार बास रह गए। जो आज भी हैं। बास घटने पर गांव का नाम घंटेल पड़ा। इसके अलावा लोगों का कहना है कि यहां घंटेलिया ब्राह्मण आकर बसे थे। उसके बाद घिंटाला प्रजापत जाति के लोग आकर बसे। जिस पर गांव का नाम घंटेल पड़ा।





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