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सत्रांक में देने उड़ी नियमों की धज्जियां, परीक्षा परिणाम में खुली पोल

बेलवा. सरकारी विद्यालयों के साथ ही निजी स्कूलों ने भी शिक्षा विभाग के नियमों की अवहेलना करते हुए नियम विरूद्ध दसवीं बोर्ड परीक्षा में मनमर्जी से सेशनल अंक दे डाले। विद्यालयों में विभागीय नियमों को ताक पर रखते हुए सेशनल में शत प्रतिशत अंक दे दिए, हालांकि परीक्षा परिणाम के बाद आखिर उन विद्यालयों की पोल पत्रिका खुल ही गई। पत्रिका पड़ताल में कई केस सामने आए जिसमें विद्यालय द्वारा शत प्रतिशत नंबर देने के बावजूद भी थ्योरी में जीरो नंबर ही आया। जिसमें कई सरकारी व निजी विद्यालयों में दसवीं बोर्ड के बच्चों को निर्धारित संत्राक 20 में से 20 अंक दे दिए, लेकिन परीक्षा परिणाम में 80 में से 0 अंक मिले।

राजस्थान पत्रिका के कमजोर परीक्षा परिणाम देने वाले स्कूलों की अंकतालिकाओं की पड़ताल की तो चौंकाने वाली हकीकत सामने आई है। जिन बच्चों को स्कूलों ने टॉपर माना और सेशनल में 20 में से 20 अंक दिए। जो कि अंक बच्चों को होशियार मानकर दिए गए। लेकिन जब बच्चों ने बोर्ड की परीक्षा दी और थ्योरी का परिणाम आया तो पोल खुल गई। अधिकांश बच्चों के 80 में से महज जीरो, दो व तीन अंक ही मिले। इससे पता चलता है कि स्कूलों ने राजस्थान बोर्ड के नियमों को भूलते हुए अपनी मर्जी से बच्चों के बोर्ड परीक्षा में प्रतिशत बढाने को लेकर खेल खेला।

बोगस विद्यार्थियों का नामांकन

निजी विद्यालय शिक्षा विभाग की उदासीनता का फ ायदा उठाकर बोगस विद्यार्थियों का नामांकन करते है। बोगस सूची में निजी विद्यालय उन बच्चों को प्रवेश देते है जो बच्चें किसी प्राइवेट नौकरी, कृषि कार्य या विभिन्न उद्योग धंधों में काम करते है, जिन्हें बोर्ड परीक्षा पास होने के प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है। वे नियमों को ताक पर प्रवेश देने वाले विद्यालयों में अपना नामांकन करवा देते है और बिना स्कूल आए परीक्षा दे देते है।

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केस-1

राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय केतू कल्ला के एक विद्यार्थी के अंग्रेजी विषय में सेशनल में 20 में से 19 अंक देने के बावजूद थ्योरी में जीरो नबंर आया। विज्ञान विषय में भी सेशनल में 20 में से 18 नबंर भेजने के बाद भी जीरो ही आया। वहीं 80 अंकों में से संस्कृत में 2, सामाजिक विज्ञान में 3 व गणित विषय में 7 अंक प्राप्त हुए। मतलब विद्यालय द्वारा 80 में से शून्य नंबर लाने वाले बच्चे को भी 20 में से 19 व 18 नंबर दिए। विद्यार्थी परीक्षा में अनुतीर्ण हुआ।

केस-2

सूर्यवीर उच्च माध्यमिक विद्यालय खुडियाला के एक विद्यार्थी के विज्ञान विषय में सेशनल में 20 में से 20 अंक देने के बाद थ्योरी में 80 में से जीरो नंबर आया। वहीं अंग्रेजी व गणित में भी सेशनल में 20 में से 20 भेजने के बाद थ्योरी में 80 में से महज 2 व 3 नबंर आए। परीक्षा परिणाम में विद्यार्थी अनुतीर्ण हो गया।

केस-3

राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय केतू कल्ला में सामाजिक विज्ञान विषय में एक विद्यार्थी के सेशनल में 20 में से 19 अंक देने के बाद भी थ्योरी में 80 में से मात्र दो नंबर आये।

केस-4

सूर्यवीर उच्च माध्यमिक विद्यालय के एक विद्यार्थी के विज्ञान विषय में सेशनल में 20 में से 20 अंक देने के बाद थ्योरी में 80 में से जीरो ही आया।

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पत्रिका व्यू

सरकारी विद्यालयों के संस्था प्रधान विद्यालय के कमजोर परीक्षा परिणाम से बचने के लिए सत्रांक भेजने के नाम पर मनमर्जी से नंबर भेज रहे है। एेसा करके वे विभागीय कारण बताओं नोटिस से बचाव का यत्न करते है, लेकिन इसका विपरीत असर विद्यार्थियों पर पड़ता है। सत्रांक में श्रेष्ठ अंक भेजने से बच्चे का अध्ययन से ध्यान भटक जाता है। बच्चा परीक्षा तैयारी से भी भ्रमित हो जाता है। वहीं निजी विद्यालय क्षेत्रीय टॉपर बनने के चक्कर में एवं बोगस विद्यार्थियों के पासिंग नंबर लाने को लेकर सत्रांक जमकर भेज रहे है। बोर्ड परीक्षा परिणाम में कम नबंर आने के बाद विद्यार्थी भी तनाव में आ जाते है। क्योंकि उनको लगता है कि स्कूल से इतने अच्छे नंबर मिलने के बाद भी बोर्ड परीक्षा में अंक कम कैसे आए, लेकिन स्कूलें अपनी साख के चक्कर में बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने के साथ ही शिक्षा विभाग के नियमों के साथ भी खेल रही है।



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