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बाघिनों के नामों पर वन अधिकारी जुटे मंथन में, लाइटनिंग,

सवाईमाधोपुर. रणथम्भौर से कोटा के मुकुंदरा में बाघिनों की शिफ्टिंग को हरी झण्डी मिलने के साथ ही रणथम्भौर में बाघिनों की शिफ्टिंग की तैयारियां शुरू हो गई हैं। वन अधिकारियों के मुताबिक रणथम्भौर से बाघिनों की शिफ्टिंग को लेकर बाघिनों की एक सूची तैयार की गई है। सूची में लाइटनिंग, ऐरोहेडेड के अतिरिक्त टी99 व टी102 को भी शामिल किया गया है। हालांकि अभी कुछ फाइनल नहीं हुआ है, लेकिन विभाग ने चारों बाघिनों की ट्रेकिंग शुरू करा दी है।


विभाग मुकुंदरा ढाई से तीन साल तक की बाघिनें शिफ्ट करना चाह रहा है। ऐसे में कुछ और बाघिनों पर भी विचार किया जा रहा है।
डब्ल्यूआईआई की टीम भी आ सकती है रणथम्भौर बाघिनों को ट्रेकुंलाइज करने के लिए विशेषज्ञों की मदद लेने पर भी विचार किया जा रहा है। नियमानुसार बाघ बाघिनों को अन्यत्र स्थनांतरित करने के लिए टे्रकुंलाइज करने के लिए डब्ल्यूआईआई की टीम की मौजूदगी होना जरूरी है। पूर्व में एनटीसीए से अनुमति नहीं मिलने के कारण बाघ टी-91 को स्थानीय टीम ने ही ट्रेकुंलाइज किया था, लेकिन इस बार एनटीसीए की ओर से शिफ्टिंग की अनुमति मिल गई है ऐसे में डब्ल्यूआईआई की टीम की भी मदद ली जा सकती है।


जर्मनी से मंगवाए रेडियो कॉलर
बाघिनों की मुकुं दरा में शिफ्टिंग के बाद निगरानी की तैयारी भी वन विभाग ने शुरू कर दी है। विभाग के अधिकारियों ने इसके लिए जर्मनी से दो रेडियो कॉलर मंगवाए हैं। वन अधिकारियों ने बताया कि जर्मनी से करीब दस दिनों में दो रेडियो कॉलर आ जाएंगे। इसके बाद ही शिफ्टिंग की कार्रवाई शुरू की जाएगी।

मुकुंदरा में भी शुरू हुई तैयारी
शिफ्टिंग की अनुमति मिलने के साथ ही मुकुंदरा में भी बाघिनों के स्वागत की तैयारी शुरू कर दी गई है। बाघिनों के मुकुंदरा आते ही 8 हजार हेक्टयार का एनकलोजर खोल दिया जाएगा। बाघिनों की टेरेटरी 200 वर्ग किलोमीटर की होगी। इसके बाद बाघों का कुनबा बढऩे पर 80 वर्ग किलोमीटर के एनकलोजर का विस्तार किया जाएगा। इसके साथ ही गागरोन तक वन क्षेत्र विकसित किया जाएगा। ऐसे में यह 200 वर्ग किमी तक हो जाएगा। इसके बाद 8 हजार हैक्टेयार वन क्षेत्र को गागरोन तक खोला जाएगा।

  • एनटीसीए की अनुमति के बाद बाघिनोंं की शिफ्टिंग का कार्य किया जाना है। इसकी तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। अभी कौनसी बाघिन को शिफ्ट किया जाएगा। यह निर्णय नहीं हुआ है।
    मुकेश सैनी, उपवन संरक्षक, रणथम्भौर बाघ परियोजना, सवाईमाधोपुर।


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