पाली. ये क्या! जिस मेडिकल कॉलेज का पालीवासी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे, जब उसकी सौगात मिली तो उसी के हॉस्पिटल के निर्माण कार्यों में पोल पट्टी चौड़े आ गई। सीवरेज के जिन गड्ढों को ढकने के लिए तकनीकी रूप से पुख्ता कार्य किया जाना था, उसकी जगह लकड़ी की प्लाई का इस्तेमाल किया जाना मॉनिटरिंग में कमी का साफ संकेत है।
मेडिकल कॉलेज के तहत बांगड़ हॉस्पिटल में भी काफी संसाधन जुटाए गए तो निर्माण भी करवाए गए। इसी कड़ी में कॉटेज वार्ड की जगह नई ओपीडी का निर्माण करवाया गया। इसके पीछे की तरफ सीवरेज के गड्ढे खोदे गए। इन पर बाकायदा सीसी का आंगन तक तैयार किया गया। इतना ही नहीं, निर्माण की गुणवत्ता में ‘काली करतूत’ को ढकने के लिए इस आंगन पर पेवर ब्लॉक बिछाने की तैयारी थी, लेकिन एक दिन पहले ही सीमेंट के पेवर ब्लाक से भरे ट्रैक्टर की एक ट्रॉली इस सीवरेज के गड्ढे में धंस गई। गड्ढे भी आठ से दस फीट गहरे। आखिर धंसे भी क्यों नही? जब घरों के सीवरेज गड्ढों को भी ढकने के लिए पत्थर के गाडर के साथ आरसीसी का निर्माण किया जाता है। लेकिन, यहां तो हद ही हो गई...। पलंग पर लगाने वाली प्लाई या कहे कि फर्नीचर के रूप में काम आने वाली लकड़ी की प्लाई से ही इन गड्ढों को ढक दिया गया। ये तो गनीमत रही कि ट्रैक्टर की ट्रॉली का हिस्सा ही धंसा। यदि इससे गुजरते समय ट्रैक्टर का अगला हिस्सा धंस जाता तो...? इतना कुछ होने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी के ये बोल कि ‘ठेकेदार को कार्य में किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं करने के निर्देश देंगे।’, गले नहीं उतरता। होना तो ये चाहिए कि ऐसे ठेकेदारों को ब्लैक लिस्टेड करने की कार्यवाही की जानी चाहिए, जो मरीजों की सुविधा में गुणवत्ता को दांव पर रखकर ‘मौत का बंदोबस्त’ करने से भी परहेज नहीं कर रहे। ऐसा भी नहीं है कि सीवरेज का ऐसा ये एक ही गड्ढा है। अकेले नई ओपीडी के पीछे कॉटेज वार्ड के सीवरेज के गड्ढों की बात करें तो वे भी पांच से ज्यादा है। जब एक में ऐसा कार्य हुआ है तो फिर अन्य में तो अंदाजा लगा ही सकते हैं। चिंता की बात तो ये भी है कि गड्ढों को ढकने में भी ऐसी करतूत है तो फिर करोड़ों की लागत से बन रहे मेडिकल कॉलेज भवन और मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में कितना गड़बड़झाला हुआ होगा। चाहे कुछ भी हो, लेकिन ये तो तय है कि निर्माण कार्यों की मॉनिटरिंग में ‘लीकेज’ जरूर है। यदि ऐसा नहीं होता तो कोई ठेकेदार ऐसे निर्माण कार्यों के मानकों को धत्ता नहीं बता सकता। ऐसे में जरूरत है इस ‘लीकेज’ को ढूंढने की, जो महज निर्माण में ही नहीं है, ‘सिस्टम’ में भी घर कर चुका है। साथ ही स्वतंत्र एजेंसी से निर्माण में गुणवत्ता के जांच कराने की भी, तभी दूध का दूध और पानी का पानी हो सकेगा।





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