श्रीगंगानगर.
शहर को अतिक्रमण मुक्त करने की मुहिम ठंडे बस्ते में जाती लग रही है। जिला प्रशासन 'सांप भी मर जाएं और लाठी भी ना टूटे' की तर्ज पर काम कर रहा है। दरअसल, राजस्थान उच्च न्यायालय में शहर को अतिक्रमण मुक्त करने के संबंध में लगाई गई जनहित याचिका में करीब सवा साल बाद जिला प्रशासन को रिपोर्ट पेश करनी है। इस रिपोर्ट में महज आंकड़ों को दर्शाया जा रहा है कि ताकि जैसे तैसे विधानसभा चुनाव से पहले आचार संहिता लगने तक मोहलत मिल जाएं। इसके बाद चुनाव के बहाने यह साल निकल जाएगा। बला को टालने में प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ नगर परिषद और नगर विकास न्यास प्रशासन ने भी कागजी प्रक्रिया अपनाने के लिए एक दूसरे को पत्र लिखने की कवायद शुरू कर दी है।
शहर में पिछले डेढ़ साल से एक भी अतिक्रमण हटाने के लिए जिला कलक्टर, परिषद आयुक्त और न्यास सचिव गंभीर तक नहीं हुए हैं। यही वजह है कि शहर में अतिक्रमण करने वाले लोगों के हौसले बढ़ गए हैं। हालांकि नगर परिषद के रिकॉर्ड के अनुसार कुल 23 सौ मे से 1900 अतिक्रमण हटाए या हट चुके हैं, शेष चार सौ अतिक्रमण के दायरे में आए भवन संचालकों या मालिकों के यहां कार्रवाई की जानी है।
कमेटी को सौंप रखा है मामला
लगभग चार सौ अतिक्रमण चिह्नित कर प्रकरण कमेटी को सौंप रखा है। जिला प्रशासन की हरी झंडी मिलते ही अतिक्रमण हटाने की कारज़्वाई अमल में लाई जाएगी।
सुनीता चौधरी,
आयुक्त, नगर परिषद, श्रीगंगानगर
यहां निशान लगाए और भूल गए
नगर परिषद प्रशासन ने पुरानी आबादी में एक भी अतिक्रमण नहीं हटाया है। इस अभियान का फोकस ब्लॉक एरिया और विनोबा बस्ती रहा था। लेकिन जिला प्रशासन ने आदेश पर परिषद अमले ने पुरानी आबादी उदाराम चौक से श्रीराम बारातघर तक अतिक्रमण के दायरे में आए भवनों पर लाल रंग के निशान लगाए थे।





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