अजमेर
जवाहर लाल नेहरू अस्पताल में लापरवाही कभी भी भारी पड़ सकती है। अस्पताल परिसर के जरा सी चूक हादसे को आमंत्रण दे सकती है। अस्पताल में ऑक्सीजन प्लांट की जगह ऐसी है कि कुछ भी गड़बड़ी होने पर चारों ओर कई मरीजों एवं चिकित्सकों, नर्सिंगकर्मियों की जान आफत में आ सकती है।
ऑक्सीजन प्लांट में चौबीस घंटे रिफिलिंग एवं अन्य छोटे प्लांट में सप्लाई का काम अनवरत जारी रहता है। अस्पताल के भवन के मध्य एक साथ तीन प्लांट संचालित हैं।
जेएलएन अस्पताल की नई आपातकालीन इकाई एवं ईएमयू के पीछे स्थित ऑक्सीजन प्लांट होने की वजह से यहां काम करने वाले कार्मिक ही नहीं अन्य को भी भय रहता है। इसकी वजह यह भी है कि ऑक्सीजन प्लांट का संचालन गैर टेक्नीनकल स्टाफ के हाथों में है।
ऑक्सीजन की सप्लाई प्रभावित होने के साथ ऑक्सीजन सिलेंडर में प्रेशर अधिक होने पर मरीजों की जान भी सांसत में पड़ सकती है। जेएलएनएच में प्रतिदिन 200 से 250 सिलेंडर की रिफिलिंग होती है। विभिन्न विभागों में छोटे प्लांटमुख्य ऑक्सीजन प्लांट से तीन प्लांट संचालित हैं इनके सहित कुल नौ छोटे प्लांटों में ऑक्सीजन की सप्लाई होती है।
कार्डियोलोजी विभाग, टीबी विभाग, ऑपरेशन थिएटर, आईसीयू, ट्रोमा सहित अन्य जगह एक-एक नर्सिंगकर्मी को जिम्मा सौंप रखा है।
नर्सिंगकर्मी बने टेक्नीशियन
ऑक्सीजन प्लांटों के संचालन से लेकर सप्लाई जांच के लिए एक भी टेक्नीशियन नहीं है। मेडिकल कॉलेज स्तर के अस्पताल में टेक्नीनिकल स्टाफ शीघ्र लगाया जाना चाहिए।
अन्यत्र स्थापित हो ऑक्सीजन प्लांटवर्तमान में संचालित ऑक्सीजन प्लांट के वार्ड एवं कैज्युल्टी से दूर अन्यत्र स्थापित किया जाना चाहिए। ताकि किसी भी अनहोनी व घटना पर मरीजों व स्टाफ की जान को बचाया जा सके। अस्पताल के मध्य अगर सिलैण्डर में ब्लास्ट की स्थिति उत्पन्न होने पर पुराने भवन से बड़ा नुकसान भी हो सकता है।
ऑक्सीजन प्लांट के शिफ्टिंग के लिए मोर्चरी के पास जगह तो चिह्नित कर रखी है लेकिन इसके लिए करोड़ तीन करोड़ रुपए के खर्च का अनुमान है। शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी से भी प्लांट शिफ्टिंग की बात की थी।
-डॉ. अनिल जैन, अधीक्षक, जेएलएनएच





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