चित्तौडग़ढ. ़कभी नल में पानी बंद होने का नाम नहीं लेता था, कुछ फीट खुदार्ई पर ही पानी की झरना फूट पड़ता था, कुओं का पानी कभी सूखता ही नहीं था।
ये सब नजारा चित्तौडग़ढ़ में अब इतिहास बन रहा है और सुबह नल में पानी आते ही अधिकतम खींचने की होड़ में सीधे मोटर लगा पानी लिया जाता है। जमीन में १००-१५० फीट खुदाई पर भी पानी नहीं मिलता। कुएं इस कदर सूख चुके है कि बोलचाल की भाषा में उनका पानी में पाताल में चल गया है। भूगर्भीय जल की स्थिति में ये बदलाव अंंधाधुंध जलदोहन के कारण बना है। इस कारण जिले के कई क्षेत्रों में जमीन में पानी बहुत नीचे चले जाने से डार्क जोन वाली स्थिति आ गई है। हैण्डपम्प व ट्यूबवैल में भी पूरा पानी नहीं आ रहा है।
जिले में प्रदूषण स्तर बढ़ऩे एवं जल संरक्षण के नाम पर ठोस कार्र्यो की बजाय सरकारी लापरवाही होने से धरती का खजाना यानि भूगर्भीय जलस्तर निरन्तर घट रहा है। ऐसे में गर्मियों में हैण्डपम्प, कुओं आदि में भी पानी नहीं मिल पा रहा है। जिले का बड़ा हिस्सा डार्क जोन में आ चुका है।
पुनर्र्भरण से अधिक हो रहा दोहन
गर्मी के मौसम में भूगर्भीय जल का अत्याधिक दोहन किए जाने के बाद बारिश के मौसम में उस अनुपात में जल का पुनर्भरण नहीं होने से हालात निरन्तर बिगड़ रहे है। मिट्टीयुक्त जमीन कम होने एवं सीमेन्ट व डामरीकरण वाले रोड बन जाने से जमीन के पानी सोंखने की क्षमता कम हो रही है। इस कारण जमीन से पानी निकाला तो खूब जा रहा लेकिन उसकी तुलना में अंदर बहुत कम पानी पहुंचने से भूजल निरन्तर कम होता जा रहा है।
पाताल में जा रहे कुएं
गांवों में आज भी कुएं पेयजल एवं खेत में सिंचाई का प्रमुख स्रोत है। कुओं से अत्याधिक पानी खींचने एवं उस अनुपात में जमीन में पानी का स्तर नहीं बढऩे से कुएं पातालतोड़ होने लगे है। कई कुएं सूख जाने से बंद करने की नौबत आ चुकी है। कुओं में पानी नहीं होने से बांध व तालाब के सतही जल की मांग बढ़ गई है।
घरों में भी खूब हो रही बोरिंग
सरकार निजी उपयोग के लिए बोरिंग कराने को भले हतोत्साहित कर रही हो लेकिन शहर में नए बन रहे मकानों में अमूमन में सभी में बोरिंग हो रही है। पुराने मकानों में भी लोग बोरिंग कराने में लगे है। इससे भी भूगर्भीय जल का अधिक दोहन शुरू हो गया है।
कैसे बचा एवं बढ़ा सकते भूजल
- बारिश का पानी जमीन में उतरे इसके लिए सड़क किनारे मिट्टी छोड़ी जाए।
- वाटर हॉर्वेस्टिंग के नियमों को प्रभावी रूप से लागू किया जाए एवं बारिश में छत का पानी धरती में पहुंचे इसका प्रयास करे।
-कुएं, हैण्डपम्प, ट्यूबवैल आदि भूजल स्रोतों का अंधाधुंध दोहन नहीं करे ताकि उनका अधिक समय तक उपयोग किया जा सके।
- पौधरोपण को प्राथमिकता दी जाए। धरती पर पेड़ अधिक होने एवं वन क्षेत्र बढऩे पर भी भूजल स्तर बढ़ाने में मदद मिलती है।





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