जयपुर/करौली.
प्रदेश में सालाना करीब 20 हजार करोड़ के दवा कारोबार और 35 हजार दवा विक्रेताओं के बावजूद औषधि नियंत्रण संगठन एक मात्र सरकारी जांच प्रयोशाला में ही नमूनों की जांच पर निर्भर हैं।
जहां राजधानी के सेठी कॉलोनी में स्थित इस प्रयोगशाला में भी जांच करने वालों के 75 फीसदी से अधिक पद रिक्त हैं। कई सालों से यही स्थिति चलने के बावजूद संगठन के अधिकारी नई दवा जांच प्रयोगशालाओं को शुरू ही नहीं कर पाएं है। वहीं करौली में भी दवा जांच प्रयोगशाला नहीं है।
तीन नई खोलने के दावे, पुरानी को भी सही नहीं चला पा रहे
राज्य सरकार कई सालों से जोधपुर, उदयपुर व बीकानेर में तीन नई जांच प्रयोगाशालाएं खोलने का दावा कर रही है, लेकिन आज तक इन्हें शुरू करना तो दूर एक मात्र जांच प्रयोगशाला को भी सही तरीके से नहीं चला पा रही है। इन तीनों के करोड़ों की लागत से भवन भी बन चुके हैं। अब दावा है कि छह माह में भर्तियां भी पूरी होगी और प्रयोगशालाएं भी खुल जाएंगी।
उधर, प्रदेश में सात साल में दवा नमूनों की जांच पेंडेंसी मामले दस गुना तक बढ गए हैं। वर्ष 2010-11 में पेंडिंग नमूने करीब 650 थे, जो वर्ष 2017-18 में इनकी संख्या करीब 6500 पहुंच चुकी है।
औचित्य ही खत्म
दवाओं के नमूने बाजार से इसलिए लिए जाते हैं कि उनकी जांच करवाकर अमानक दवाओं पर प्रतिबंध लगाया जा सके। लेकिन जांच समय पर नहीं होने से नमूने लेने का औचित्य ही समाप्त हो रहा है। समय पर जांच और रिपोर्ट तैयार नहीं होने के कारण अमानक दवाइयां भी बाजार में बिकती रहती है।
वहीं प्रदेश के औषधि नियंत्रक अजय फाटक का कहना है कि जल्द ही प्रदेश में स्टाफ की भर्ती व नई प्रयोगशालाएं शुरू होने के बाद यह समस्या काफी हद तक कम हो जाएगी।
पेंडेंसी बढऩे के कारण
जूनियर साइंटिफि क असिस्टेंट व रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने वाले ड्रग एनालिस्ट, तकनीकी व विश्लेषण स्टाफ के पद कई सालों से रिक्त
दवा नमूने लेने वाले अधिकारी कई, नमूनों की जांच करने वालों की कमी, तीन प्रयोगशालाएं आज तक शुरू ही नहीं हो पाई।





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