राजसमंद. ऊंची-ऊंची पहाडिय़ां, ठण्डी और हरियाली से भरपूर तलहटी, सर्पिलाकार रास्ते, खरंजे पर दौड़ते जिप्सी के पहिये और कुछ रोमांचकारी दिख जाने की लिप्सा में दाएं-बाएं कनखियों पर घूमती आंखें। जंगल के रोमांच को जीने का यह अहसास अब सूखने लगा है। विश्व विरासत कुम्भलगढ़ देखने आ रहे देशी-विदेशी सैलानियों को नेशनल पार्क की जंगल सफारी निराश करने लगी है। वजह यह कि जंगल में लगातार घटते शिकार के जीवों ने पैंथरों को पलायन करने पर मजबूर कर दिया है। ज्यादातर पैंथर आबादी में हैं। नेशनल पार्क में अब पैंथर और भालू जैसे जीवों की मौजूदगी कम होने से रोमांच घट रहा है। पैंथर, भालू और जरख अब नहीं दिख रहे। पर्यटकों को महज जंगली मुर्गे, बमुश्किल दिखते साम्भरों से ही तसल्ली करनी पड़ रही है। आंकड़े बदतर होते हालात को बयां कर रहे हैं। दुर्ग देखने आ रहे सैलानियों में से महज पांच फीसदी लोग भी जंगल देखने नहीं जा रहे हैं। वर्ष 2016 में 3.29 फीसदी, वर्ष 2017 में 1.82 और वर्ष 2018 में 30 जून तक महज 1.80 प्रतिशत पर्यटकों ने ही जंगल सफारी की। घटते सैलानियों से विभाग की आय में भी कमी आ रही है।
रोमांच की उम्मीद करते हैं सैलानी
कुंभलगढ़ अभयारण्य में दूर-दूर से आने वाले पर्यटकों को उम्मीद रहती है कि मेवाड़ और खासकर कुम्भलगढ़ की घनी, दुर्गम पहाडिय़ों में पैंथर और भालुओं की मौजूदगी का घनत्व अच्छा है और इन जंगली जीवों के अलावा भी उन्हें देखने को बहुत कुछ जरूर मिलेगा। सैकड़ों वर्ग किलोमीटर में फैले जंगल में कई दुर्लभ जीव भी देखने की लालसा रहती है।
ऐसी है हकीकत
22 किलोमीटर लम्बे ट्रेक पर सफारी करने के दौरान उनकी आंखें हर पल पैंथर की चहलकदमी या भालुओं की उछलकूद देखने के लिए लालायित रहती हैं, लेकिन सरपट दौड़ते जंगली मुर्गे और इक्का-दुक्का साम्भर के अलावा कुछ नहीं दिखता। उनके मन को दिलासा देने के लिए जिप्सी चालक एक-दो प्वॉइंट पर गाड़ी रोककर उन्हें फोटोग्राफी कर लेने को कह देते हैं।
यह है पसंदीदा रूट
आरेट फाटक से मीठी बोर, महुड़ी खेत, ढाणा फाटक, कोठारवड़, सात वड़ली, दाणी वट्टा, बीड़ की भागल से होती हुई जिप्सी मुख्य सड़क पर आती है। यह पूरा रूट 22 किमी लम्बा है। पाली जिले की सादड़ी रेंज में रणकपुर से भी कुछ जिप्सियां चलती हैं, जो दूसरे 24 किमी ट्रेक पर सफारी करवाती हैं।
नए रूट से बेखबर सैलानी
कुंभलगढ़ अभयारण्य में पर्यटकों की तादाद बढ़ाने की कोशिश में वन विभाग ने पिछले वर्ष ही तीसरा नया रूट शुरू किया। जो कि फूटा देवल से 13 किमी जंगल में तथा तीन किमी सड़क मार्ग से होता हुआ रणकपुर मंदिर तक पहुंचता है। चार घंटे में सैलानी इस रूट से जंगल सफारी तथा दर्शन दोनों का लुत्फ उठा सकते हैं, वहीं सड़क मार्ग से केलवाड़ा से रणकपुर 60 किमी दूर है। इस रूट की पर्यटकों को पर्याप्त जानकारी नहीं होने और प्रचार-प्रसार की कमी से सैलानी रणकपुर तक नहीं जा रहे।
वन विभाग का दावा
जंगल में पैंथर, भालू, जरख, सियार, चौसिंगा, साम्भर, मोर, बंदर, जंगली मुर्गे और जंगली ***** नजर आते हैं। यह भी कहना है कि सभी पर्यटक जंगली जीव ही देखने नहीं आते, जंगल में घूमने और प्राकृतिक वातावरण का लुत्फ लेना भी उनकी यात्रा का मकसद होता है।
विभाग ने खुद हाथ में ली बुकिंग
सैलानियों से मनमाने दाम वसूली को रोकने पिछले साल विभाग ने केलवाड़ा में खुद का बुकिंग ऑफिस खोलना पड़ा। यहां सैलानियों को सही दर की जानकारी दी जाती है। पूर्वमें प्राइवेट जिप्सी संचालक खुद शुल्क वसूलते थे। एन्ट्री 200 रुपए तथा 50 रुपए प्रत्येक सैलानी पर देय शुल्क विभाग को मिलता है। कुम्भलगढ़ रेंज में कुल 26 जिप्सी पंजीकृत हैं, जबकि 5 जिप्सी सादड़ी में हैं। यहां औसतन दो से तीन जिप्सी ही बुक हो रही है। संचालकों को भी उम्मीद के मुताबिक आय नहीं हो रही है।
अनुभव का बयां
कुम्भलगढ़ का जंगल घना है। सुबह के वक्त सुनसान जंगल का मौसम सुहावना था, लेकिन ढाईघंटे की सफारी में केवल दो जंगली मुर्गे, एक मोर और एक साम्भर नजर आया। पूरी सफारी के दौरान हमारी नजरें इधर-उधर दौड़ती रही। जैसा कि सुना था कि यहां पैंथर और भालू दिखते हैं, नजर नहीं आने से निराशा हुई।
सपना सिंह, घरेलू पर्यटक
पैंथर हैं, लेकिन दिखते नहीं
तीनों रूट घाटियों में बने हैं, जहां से ऊंची पहाडिय़ों पर विचरते जीव नजर नहीं आते हैं। अन्दर शिकार के जीवों की भी कमी नहीं है। जंगल से ज्यादा आबादी में पैंथर इसलिए हैं कि उनके लिए शिकार, रहवास का माहौल मुफीद है। हमने सरकार को पैंथर रिजर्व प्रोजेक्ट का प्रस्ताव भेज रखा है, जो मंजूर नहीं हुआ है। इसके अलावा और कोईयोजना नहीं है। वर्तमान में जो इंतजाम हैं, उनका ही प्रबंधन करना मुश्किल हो रहा है।
कुमार स्वामी गुप्ता, उपवन संरक्षक (वन्यजीव), राजसमंद
संतुलन बिगड़ा
जंगल और आबादी का संतुलन बदल रहा है। पालतू मवेशी जंगल में चरने जाते थे। पैंथरों को भोजन आसानी से उपलब्ध था। दखल बढ़ गया। पैंथरों ने आबादी में रुख किया। अभयारण्यों में पसंदीदा जंगली जीव किस्मत से 10 तिशत को ही दिखते हैं।
औंकारलाल मेनारिया, सेवानिवृत्त उपवन संरक्षक





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