ओमप्रकाश शर्मा/जयपुर. नकली घी प्रकरण में एसीबी जांच ने पांच साल बाद यू-टर्न लेना शुरू कर दिया है। एसीबी ने पुलिस के एक बड़े पूर्व अधिकारी को क्लीनचिट देने की तैयारी कर ली है। शुरू से जांच के केन्द्र रहे पूर्व डीजी जसवंत सम्पतराम के खिलाफ जांच अधिकारी ने फाइल पर चालान के लायक साक्ष्य नहीं माने हैं। यह तथ्य आने के बाद फाइल विधि अधिकारियों के पास भेजी गई है। हालांकि दर्ज मामले में पूर्व डीजी (पुलिस हाउसिंग) जसवंत संपतराम नामजद नहीं हैं। उनका नाम तफ्तीश के दौरान सामने आया। यह मामला उस समय दर्ज हुआ जब एसीबी मुखिया अजीत सिंह थे। जसवंत सम्पतराम व अजीत सिंह एक ही बैच के आइपीएस अधिकारी थे। एसीबी ने सिंघल व अन्य के मोबाइल सर्विलांस पर लिए थे। इस दौरान रिकॉर्ड हुई बातचीत में सम्पतराम और सिंघल की नजदीकी उजागर हुई। आरोप है कि सिंघल पुलिस अधिकारियों को सम्पतराम के माध्यम से मनमाफिक स्थान पर पोस्टिंग दिलाता था। जांच के दौरान ही जसवंत सम्पतराम डीजी बने और गत वर्ष सेवानिवृत भी हो गए।
बदलते रहे जांच अधिकारी
इस मामले में तफ्तीश ने गति अब पकड़ी है, खुद अजीत सिंह भी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। हरदयाल सिंह के बाद इस मामले की तफ्तीश अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक नरेन्द्र सिंह व मंगलाराम ने भी की। अब तफ्तीश राजकमल के पास है। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने जसवंत सम्पतराम के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं माने हैं। इस पर उच्चाधिकारियों से चर्चा भी हो गई। अभी तक जो नतीजा सामने आया है उस पर कानूनी राय के लिए विधि अधिकारियों से चर्चा की जा रही है। मामले में अभी एसीबी मुखिया की राय आना बाकी है।
ऐसे करते थे कमाई
एसीबी ने 8 दिसम्बर 2013 को एकसाथ विभिन्न स्थानों पर छापे मारकर नकली घी के कारोबार का खुलासा किया था। मुख्य सरगना दिनेश सिंघल सहित 27 अभियुक्त गिरफ्तार किए गए। जिसमें खाद्य विभाग के अधिकारी भी शामिल थे। कार्रवाई में सामने आया कि नकली घी कारोबार में स्वास्थ्य, पुलिस व अन्य विभागों के अधिकारी लिप्त हैं, जो
मोटी कमाई कर रहे थे। एसीबी ने 11 मामले दर्ज किए, जिसमें सिंघल हर मामले में अभियुक्त है।





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