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यह है हमारी मलाला यूसुफजई...अंधेरों से लडऩे खुद बाती बनी, जलाई शिक्षा की लौ

राजसमंद. कहते हैं भगवान उन्हीं का इम्तिहान लेता है, जो लाखों बाधाओं का डटकर सामना करने का माद्दा रखता हो। पाकिस्तान की नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई के जैसी ही इस इलाके में भी शिक्षा की प्रेरणापुंज बनकर संघर्षकर रही लीला की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।
रेलमगरा तहसील की बनेडिय़ा पंचायत के अर्जुनगढ़ की लीला जाट (२२) पुत्री छोगालाल जाट की जिन्दगी मुश्किलों से भरी रही। वह उसका संघर्ष प्रेरणा बन चुका है। बचपन से ही उसकी मां बीमार रहती थी। पिता जब स्वस्थ थे, तब तक घर ठीक-ठाक चल रहा था। पिता के अचानक बीमार और मानसिक बीमार होने से सारी जिम्मेदारी बालपन में ही लीला पर आ गई। अस्वस्थ मां-बाप की देखभाल करना, छोटे भाई बोथूराम की पढ़ाई खर्च और उसके साथ खुद की पढ़ाई मानो सामने अचानक पहाड़ आ खड़ा हुआ हो। इन हालात में उसके खुद के सपने को भी जिन्दा रखना था। मुश्किल दिखाई दे रहा था, लेकिन उसे पता था कि नामुमकिन कुछ भी नहीं। उसने धीरे-धीरे खेती में हाथ आजमाया। उससे हुईआमदनी को मां-बाप के इलाज में खर्च किया और भाई व स्वयं की पढ़ाई का खर्चा भी चलाया।

पिता का साया उठा
लीला की जिंदगी में खेती करना, घर का काम, माता-पिता की देखभाल और दोनों की पढ़ाई की जिम्मेदारी उसने इतनी शिद्दत से उठाई कि उसे यह जिन्दगी का एक जरूरी हिस्सा लगने लगा। एक साल पहले बीमारी के चलते पिता का निधन हो गया। उसने सारे सामाजिक रीति-रिवाज पूरे करवाए, अब बीमार मां की देखभाल में जुटी हुई है।

लीला बीएड कर रही, भाई बीएससी
इतनी बाधाओं के बाद भी वह अपने सपने को पूरा करने के लिए बीएड की पढ़ाई कर रही है। वह अपने भाईको भी प्रेरित कर बीएससी की पढ़ाई करवा रही है। उसका संकल्प है कि दोनों मिलकर जिन्दगी में छाए अंधेर को दूर करेंगे।

बाल विवाह का किया था विरोध
बचपन में ही पिता ने लीला की सगाई कर दी। पिता की मौत के बाद परिवार वालों ने शादी का दबाव बनाय, लेकिन उसने साफ इनकार कर दिया। उसने कहा- अभी मुझे पढ़-लिखकर अध्यापिका बनना है। ऊपर से बीमार मां और भाई का ख्याल भी रखने की बड़ी जिम्मेदारी कंधों पर है। लीला ने खुद पहल कर ससुराल पक्ष को सगाई तोडऩे का संदेश भेज दिया।

पांच घटे आराम, बाकी काम और पढ़ाई
लीला सुबह पांच बजे उठते ही गाय-भैंस का दूध निकालती है। चाय बनाकर मां और भाई को पिलाकर परिवार के लिए खाना बनाती है। फिर खेत पर चली जाती है। वहां समय मिलने पर पढ़ाई करती है, बाकी खेती के काम में जुटी रहती है। वापस शाम को लौटकर घर का काम करती है और रात दस से दो बजे तक पढ़ाई में जुटी रहती है। इस बीच मां को दवा देना, भाई की रोजाना की पढ़ाई पर ध्यान देने की जिम्मेदारी भी बखूबी निभा रही है। लीला का संघर्ष देख आसपास और गांव के लोग उसके जज्बे को सलाम करते हैं।



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