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नौनिहालों में घुल रहा कुपोषण का जहर


- आंगनबाडी व आशा सहयोगी नहीं भेज रहे बच्चे को
सीकर. शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में अग्रणी रहने वाला जिले के बच्चे कुपोषण का दंश भुगत रहे हैं। बानगी है कि पिछले 18 माह में अकेले एसके अस्पताल में कुपोषण के शिकार 185 बच्चों को जान बचाने के लिए भर्ती किया गया। चिकित्सकों की माने तो जिले की आंगनाबाडी व आशा कुपोषित बच्चों को चिन्हित कर एमटीसी वार्ड में भेजे तो यह आंकड़ा तीन गुना तक बढ़ सकता है। खास बात यह है कि इनमें से 18 बच्चों अतिकुपोषित होने के कारण पीडियोट्रिक वार्ड या जयपुर रैफर करना पड़ा। रही सही कसर एमटीसी वार्ड में पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से हो गई है। इन 18 माह की अवधि में इन कुपोषित बच्चों में दो बच्चों की मौत भी हो चुकी है। चिक्त्सिकों की माने तो जिले में कुपोषित रही सही कसर रैफर नहीं करने से हो गई है।
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सुविधाओं की कमी परेशानी
एमटीसी वार्ड के संचालन के लिए अस्पताल परिसर में केन्द्र सरकार एसके अस्पताल स्थित एमटीसी वार्ड को पिछले दिनों एसके अस्पताल परिसर में बर्न यूनिट के पास ट्रांसफर कर दिया गया। एक कमरे में संचालित हो रहे वार्ड में रात को कुपोषित बच्चों का उपचार भगवान भरोसे है। रात के समय भर्ती यदि कोई बच्चा गंभीर हो जाए तो उनके तीमारदारों के पास सिवाय गिड़गिड़ाने के कोई चारा नहीं है। वार्ड में गंभीर भर्ती बच्चों की 24 घंटे की गतिविधि डाक्टर के हिसाब से तय की जाती है लेकिन ना तो उन्हें रात की डाइट के हिसाब से दवा व पोष्टीकता की सामग्री मिल पाती है और ना ही उपचार हो पाता है।

2017 में भर्ती बच्चों की संख्या
जनवरी-2
फरवरी-5
मार्च-6
अप्रेल-19
मई-10
जून-4
जुलाई-12
अगस्त-9
सितम्बर-5
अक्टूबर-6
नवम्बर-4
दिसम्बर-2

2018
जनवरी-9
फरवरी-12
मार्च-14
अप्रेल-17
मई-11
जून-18

छह माह तक पिलाएं मां का दूध
कुपोषण से बच्चे को बचाने के लिए छह माह तक लगातर ब
मां की अनदेखी पड़ती है भारी
महिलाए गर्भधारण के दौरान भी अपने पोषण पर न ध्यान देती है। इसका असर गर्भ में पल रहे बच्चे पर पड़ता है। चिकित्सकों ने बताया कि जानकारी के अभाव में कई मां बच्चों को उनकी पसंद का आहार देते रहती हैं। ये आहार स्वाद में तो अच्छे होते हैं लेकिन सेहत की दृष्टि से नुकसान पहुंचाते हैं। समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चे जन्म से कमजोर होते हैं। इस दौरान थोडी से लापरवाही बच्चों को कुपोषण की जद में ले लेती है। चिकित्सकों ने बताया जिन्हें जन्म से ही बीमारियां जैसे- सिसिटक फाइब्रोसिस, कैंसर इत्यादि होती है।

कुपोषण के लक्षण -
कुपोषण छह माह से तीन वर्ष के बीच के बच्चों में सर्वाधिक होता है। कुपोषण की पहचान बच्चे को थकावट, कमजोरी, कब्ज, लम्बाई नहीं बढऩा, पेट व पैरों में सूजन, रूखे और चमक रहित बाल, चमकहीन चेहरा, शरीर की ग्रोथ नहीं होना, पेट विकृत रूप से बढ़ा होना, हाथ-पैर सामान्य से पतले होने और मांसपेशियां सिकुड जाना है। पोषक तत्वों की कमी की कमी के कारण कुपोषित बच्चे बेरी-बेरी रोग प्रमुख है।

अत्यधिक भोजन भी घातक
बच्चे को अत्यधिक पोषक पदार्थों खिलाना भी नुकसान देह होता है। इस कारण बच्चे के सही आहार लेने के बावजूद, उसका स्वास्थ्य नहीं बनता और ऐसे बच्चें कुपोषण के शिकार हो जाते हैं।

कुपोषित बच्चे नहीं आने से निम्न तबके तक चिकित्सा सेवाएं नहीं पहुंच पाती है। जिम्मेदार सही तरीके से मॉनिटरिंग करे तो यह आंकड़ा बढ़ सकता है। एमटीसी वार्ड में भर्ती बच्चे ओपीडी व वार्ड से चिन्हित किए गए हैं। जिले से रैफर बच्चों के नहीं आने से परेशानी होती है। कुपोषण के बच्चे कम आते हैं।
- डॉ. अशोक बिजारणिया, शिशु रोग विशेषज्ञ



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