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पढ़े-लिखे समाजों में भी खाप का खौप, दब गई कई आवाजें, जो अब तक नहीं उठ पाई

जिले में विभिन्न पिछड़े और पढ़े-लिखे समाजों में भी ऐसे सैकड़ों मामले हैं। आए दिन कहीं न कहीं कोईप्रकरण सामने आता है। इन मामलों में बहिष्कृत किए गए परिवार की गलती सिर्फ मान-मर्यादाओं के आधार पर तय कर दी जाती है, जबकि भारतीय कानून में उन्हें अपने ढंग से जिन्दगी जीने का पूरा हक है। यही नहीं, कई मामलों में किसी और की गलती की सजा किसी और के सिर मढ़ दी जाती है।

काम कर रहे पंचों के संगठित गिरोह
कईसमाजों में पंचों के संगठित गिरोह काम कर रहे हैं, जो पीडि़त पर समाज से बहिष्कृत करने का डर और दबाव बनाकर उनसे मोटा पैसा वसूल रहे हैं। इस पैसे को समाज की बेहतरी में खर्चकरने की बात कही जाती है, लेकिन समाज के उत्थान में यह पैसा कहां लगा है और उसका क्या हिसाब-किताब है, यह सिर्फ ‘पंच-परमेश्वर’ ही जानते हैं।

 

खौफ की पंचायतों में हो रहे ऐसे फैसले
- परिवार में अगर किसी की मौत हो जाए तो, उसे दंड स्वरूप तय शुल्क का भुगतान करना पड़ता है, मना करने पर समाज से निष्कासन, कारण पूछने पर कोई कारण नहीं बताया जाता।
- अपनी मर्जी से समाज से बाहर किसी जाति में शादी करने पर पूरे परिवार का समाज से बहिष्कार।
- किसी व्यक्ति ने अदालत के जरिये तलाक लिया और बाद में अपनी मर्जी से शादी कर ली, तो समाज की नजर में वह गुनहगार माना जाता है। उस पर जुर्माने और बहिष्कार का बोझ लाद दिया जाता है।
- हर तरफ मृत्युभोज की पाबंदी लेकर जागरूकता फैलाई जा रही है, लेकिन कतिपय समाज में यह मान-मर्यादा और कथित मेल-जोल का मंच बना हुआ है। ऐसे कुतर्कों के आधार पर समाज के पंच पीडि़त परिवार के आंसुओं को भुलाकर जीमण में शामिल होने में रुचि दिखा रहे हैं। ऐसा ही एक उदाहरण देखें : थामला निवासी प्रभुलाल पुत्र भैरूलाल (बदला हुआ नाम) ने पिता की मृत्यु के बाद सारे क्रिया-कर्म तो कर दिए, मगर मृत्युभोज नहीं किया। खफा होकर समाज के पंचों ने उसे समाज से बाहर कर दिया।
- कतिपय समाज ने भू-राजस्व सम्बंधी मामले भी अपनी अदालतों में ले रखे हैं। पैसा लेकर किसी के भी पक्ष में फैसला करके वह पीडि़त को सजा देने से बाज नहीं आते।

इन खापों के कानून संविधान से अलग
खाप पंचायतों ने ऐसे कई नियम बना रखे है, जो भारतीय संविधान से काफी अलग हैं। कानूनी जानकार कहते हैं कि भारत में सिर्फ भारतीय संविधान और कानून ही चल सकता है। इसके समानांतर या ऊपर-नीचे और कोईकानून नहीं है। मगर अफसोस कि अदालतों का डर भुलाकर समाज के लोग दकियानूसी नियमों की पालना कराने के लिए पीडि़तों का और ज्यादा शोषण कर रहे हैं।



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