अश्वनीप्रताप सिंह . राजसमंद. मृण शिल्पकला के लिए विश्वभर में मशहूर मोलेला की टेराकोटा आर्ट पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। मिट्टी को मनमुताबिक आकार देने में मृणशिल्पकारों के पसीने छूटने लगे हैं। यहां की मिट्टी अब आकार देने लायक नहीं रही। मूर्तियों पर किया जाने वाला बारीक काम सफाई और गुणवत्ता से नहीं हो पा रहा है। इसकी वजह है उपयोग में ली जाने वाली विशेष गुणवत्तायुक्त मिट्टी के भंडार का सिमटना। मोलेला और पास ही के गांव सेमा के दो तालाबों में यह विशेष मिट्टी पाई जाती है, जिसका भंडार लगभग समाप्त हो चुका है। ऐसे में अगर इस ओर शीघ्र ही ध्यान नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब मोलेला का टेराकोटा इतिहास में तब्दील हो जाएगा।
सरकार ने ही खत्म कर दिया मिट्टी का भंडार
मोलेला के टेराकोटा को पहचान दिलाने में यहां की विशेष चिकनी मिट्टी का सबसे बड़ा योगदान है। यह मिट्टी मोलेला के आसुला तालाब और सेमा के सोलह का सापा तालाब में है। मोलेला के आसुला तालाब को वर्ष २०१५ में मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान के तहत गहराकर दिया गया, जिससे इसकी गुणत्तापूर्ण मिट्टी समाप्त हो गई। वहीं सेमा के तालाब पर अतिक्रमण होने से मिट्टी खत्म हो गई है।
मिट्टी में कंकरीट, बिगड़ रही गुणवत्ता!
सरकारी नुमाइदों की अनदेखी के चलते आसुला तालाब में यहां के ईंट भट्टा संचालकों ने भट्टे की पकी मिट्टी, टूटे ईंट के टुकड़े बड़ी मात्रा में डाल दिए हैं, जिससे मिट्टी में कंकरीट मिल गई है। मूर्ति निर्माण के दौरान कंकरीट के बारीक कण मिट्टी की गुणवत्ता को खराब कर रहे हैं। साथ ही बारिश के दौरान पानी के साथ बहकर आई रेत भी चिकनी मिट्टी की चिकनाहट को समाप्त कर रही है, जिससे बर्तनों में दरारें आने तक की समस्या भी सामने आने लगी है।
उदयपुर तक जाती थी मिट्टी
यहां के मृणशिल्पकारों ने बताया कि मिट्टी यहां की चिकनी मिट्टी पूर्व में उदयपुर, पाली आदि क्षेत्रों के कुम्हार बर्तन बनाने के लिए ले जाते थे, लेकिन वर्तमान में यहां के कुम्हारों के लिए ही पर्याप्त मिट्टी नहीं बची है।
बनती हैं ये मूर्तियां
विश्व प्रसिद्ध श्रीनाथजी की नगरी से करीब १७ किमी दूर मोलेला गांव है। इस गांव का मृणशिल्प विश्वप्रसिद्ध है। यहां के कई कलाकार अन्तरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। टेराकोटा आर्ट से यहां के कलाकार जैसे मिट्टी में भी प्राण फूंक देते हैं। ये कलाकार अपने शिल्प से दीपावली के विभिन्न प्रकार के दीए, श्रीनाथजी, महाराणा प्रताप, हाथी, घोड़े, बेल, दीपक के स्टैड, गणेशजी, तरह-तरह की घंटियां, स्थानीय लोक देवताओं आदि के मृण शिल्प बनाते हैं। यहां के मृणशिल्पकार गीली मिट्टी को विभिन्न सांचों में डालते हैं, बाद में चाक के साथ ही भिन्न-भिन्न औजारों के द्वारा शिल्प को सजाया-संवारा जाता है। बाद में इसे भट्टी लगाकर आंच में पकाया जाता है, ताकि यह और भी अधिक मजबूत हो जाएं। अन्त में टेराकोटा कलर, चुने व अन्य रंगों का उपयोग करते हुए इसे आकर्षक बनाया जाता है।
कला सीखने हर साल आते हैं विदेशी
यहां माटी को आकार देने का काम इतनी कुशलता से होता है कि प्रतिवर्ष दर्जनों विदेशी सैलानी यहां आते हैं और कई दिन तक यहां रुककर कलाकारों से इस कला का प्रशिक्षण लेते हैं। यहां मृण शिल्पकार कई बार विदेश जाकर अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं, जिसके चलते कई कलाकारों राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं।
अब कहां से लाएं मिट्टी...?
पहले ही मिट्टी की गुणवत्ता बिगड़ रही थी, वर्ष २०१५ में मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन के तहत चिकनी मिट्टी का मुख्यस्रोत आसुला को गहराकर दिया गया, इससे गुणवत्ता युक्त मिट्टी समाप्त हो गई। आज तालाब पर इतने ईंट पत्थर पड़े हैं कि अच्छी मिट्टी निकलती ही नहीं है। हमने तालाब की खुदाई के दौरान कुछ मिट्टी का भंडारण कर लिया था, वह अब खत्म होने वाली है। सेमा के तालाब पर लोगों ने अतिक्रमण कर रखा है। ऐसे में अब हमारे सामने मिट्टी का संकट खड़ा हो रहा है।
राजेंद्र कुम्हार, मृणशिल्पकार, मोलेला





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