बीकानेर. सरकारी स्कूलों में सरकारी योजनाएं तो शुरू कर दी गई हैं, लेकिन इससे शिक्षण व्यवस्था गड़बड़ाने की आशंका बढ़ गई है। योजनाओं के तहत स्कूलों में प्रार्थना, योग, संत-महात्माओं के प्रवचन, व्याख्यान, प्रतियोगिताएं, पोषाहार के बाद अब दूध का वितरण किया जा रहा है। ये सभी काम स्कूल समय में ही किए जाने हैं। एेसे में शिक्षकों के साथ बच्चों का भी पढ़ाई का समय जाया हो रहा है।
स्कूल सुबह ८:१० बजे शुरू होती है।
इसमें ३५ मिनट की प्रार्थना सभा होती है। इसके बाद विद्यार्थियों को दूध पिलाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। कई स्कूलों में ज्यादा विद्यार्थी होने से दूध पिलाने में करीब दो घंटे लग जाते हैं। इसके बाद करीब पौन घंटे का समय शेष रहता है। इसके बाद करीब ११ बजे मध्यांतर हो जाता है। इस दौरान पोषाहार बनाया जाता है और विद्यार्थियों को दिया जाता है। इसके बाद चार कालांशों में सही ढंग से पढ़ाई हो पाती है, जिससे सरकारी स्कूलों का परिणाम गिर सकता है।
परिणाम सुधार की योजना नहीं
सरकार की ओर से सरकारी स्कूलों का परीक्षा परिणाम सुधारने के लिए कोई योजना नहीं बनाई जा रही है। हाल ही आए पांचवी, आठवीं, दसवीं तथा बारहवीं के परिणामों पर नजर डालें तो सरकारी स्कूलों का परिणाम कम रहा है। पहले जहां स्कूलों में सिर्फ पढ़ाई होती थी, वहीं अब स्कूलों में पढ़ाई नाममात्र की रह गई है।
दबाव के चलते कर रहे आंकड़े सही
विद्यालयों के प्रधानाचार्यों, प्रधानाध्यापकों पर भी सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन का दबाव रहता है। इससे वे योजनाओं की खानापूर्ति के लिए पूरे दिन अथवा स्टाफ की सहायता से आंकड़े सही करने में लगे रहते हैं। पिछले दिनों शाला दर्पण पर आंकड़ों को ऑनलाइन करने के दबाव व समय पर फीडिंग नहीं होने से उन पर विभागीय कार्रवाई होने की तलवार लटकी रहती है।
इससे बचने के लिए वे इन आंकड़ों को पढ़ाई के मुकाबले ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। जिन विद्यालयों में स्टाफ कम अथवा एक या दो अध्यापक ही हैं, वहां स्थिति ज्यादा खराब है। उनको सरकारी योजनाओं के साथ पंचायत पदेन शिक्षा अधिकारी को भी सूचना भेजनी पड़ती है। एेसे में उन विद्यालयों की पढ़ाई का स्तर तथा गुणवत्ता में कमी आ रही है।
शिक्षकों के सामने समस्या
दो जुलाई से शुरू हुई दूध वितरण योजना को लेकर शिक्षकों के सामने समस्या खड़ी हो गई है। शिक्षक अपने मूल काम से हटकर पोषाहार व दूध वितरण में लग गए हैं।
करेंगे मॉनिटरिंग
स्कूलों में सरकारी नीतियों का पालना कर रहे है। गांवों में सरकारी स्कूलों में अन्य कामों के लिए पंचायत सहायक से मदद लेंगे। जिन स्कूलों का परिणाम कम रहा है, उनकी कार्ययोजना बनाकर मॉनिटरिंग करेंगे।
सुनील बोड़ा, अतिरिक्त जिला शिक्षा अधिकारी (माध्यमिक), बीकानेर
स्कूलों में दूध व पोषाहार वितरण में काफी समय व्यतीत हो रहा है। सरकार को कई योजनाओं पर पुनर्विचार करना चाहिए। इससे स्कूलों में पढ़ाई पर काफी असर पड़ेगा।
किशोर पुरोहित, प्रदेश संरक्षक, शिक्षक संघ भगतसिंह





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