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पढियें खबर कैसे टूटी नहरो के साथ ही टूट रही है किसानो की उम्मीदे....

 

पाली/सादड़ी। उपखण्ड़ क्षेत्र में सुखद बारिश से आधा दर्जन बान्ध लबालब होंगे। इससे जल संसाधन विभाग व सरकार को सिंचाई कर से अच्छा राजस्व प्राप्त होगा, लेकिन बांध नहरी तन्त्र सुदृढ़ीकरण व मरम्मत कार्यों को लेकर सरकार से अभी तक एक भी बान्ध के नाम कोई बजट मुहैया नहीं हो पाया है। इससे खस्ताहाला नहरें माइनर जस की तस हैं। ऐसी परिस्थितियों में लबालब बान्ध से सिंचाई दौरान किसानों को इस बार भी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। कच्ची व टूटी नहरों से पानी की बर्बादी से किसान सिंचाई से वंचित रह जाएंगे। विभाग से सभी बान्ध के मरम्मत, पुन: निर्माण व साफ-सफाई को लेकर तखमीना प्रस्ताव बनाकर भेजे गए हैं लेकिन अब तय स्वीकृति नहीं आई है। ये स्थिति पिछले कई सालों से है।

रणकपुर बांध की खस्ताहाल नहरें

उपखण्ड़ का वृहद सिंचाई व पेयजलापूर्ति स्रोत 62.70 फीट भराव क्षमता के राणकपुर-सादड़ी बान्ध की मुख्य कैनाल से निकलने वाली आमलिया, सदर व रामसागर नहर कई जगह से कच्ची व क्षतिग्रस्त हैं। यहां हर बार एकसाथ जल वितरण के दौरान हेडकमाण्ड़ में सिंचाई सम्भव हो पाती है, टेल का अंाशिक भाग कच्चा होने के कारण पर्याप्त जलदबाव से पानी बह नहीं पाता है। नहरों में पानी बढ़ाते ही खेतों में नहर टूटने का भय रहता है। प्रतिवर्ष सैकड़ों बीघा कृषिभूमि सिंचाई से वंचित रहती है।

राजपुरा बान्ध का नहीं सुधर पाया नहरी तन्त्र

भगवान परशुराम महादेव तपोस्थली तीर्थ की तलहटी में स्थित 22.25 फीट भराव क्षमता के राजपुरा बान्ध का निर्माण 1962-66 में हुआ। उस दौरान जिन नहरों का निर्माण हुआ उनकी आज तक मरम्मत तक नहीं हुई। पिछले दो तीन वर्षों में मनरेगा में मैन कैनाल से जल अपव्ययव पानी आगे नहीं बढ़ पाने की स्थिति में अंाशिक भाग में नवीनीकरण किया। शेष नहरी तंत्र जस की तस हालात में है। कई जगह नहरों की स्थिति बिगड़ी हुई है। सिंचाई के दौरान किसान कभी पहले टेल तो उसके बाद हेड कमाण्ड़ सिंचित करते हैं। इससे एक पखवाड़े का अन्तराल हो जाता है। ऐसे में फसल उत्पादन भी प्रभावित होता है। कई बार तो सुरानाड़ी कमाण्ड़ किसानों को तो एक पाण सिंचाई में ही सन्तोष करना पड़ता है। बांध जल उपभोक्ता संगम पूर्व अध्यक्ष गुमानसिंह राजपुरोहित ने नहरी तन्त्र सुदृढ़ीकरण को लेकर कई बार उच्चाधिकारियों को पत्र व्यवहार किया। नहरो में व्यापक सुधार नहीं होता देख उन्होंने संगम अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया।

इस बार भी नहीं बिलीया माइनर निर्माण

जूणा-मालारी बान्ध कमाण्ड़ क्षेत्र ग्राम बिलीया की सिंचित कृषिभूमि में जाने वाले बिलीया माइनर नहर का निर्माण इस बार भी सरकार से बजट के अभाव में नहीं हो पाया। बांध ओवरफ्लो रपट पर बनी जलकटाव सरफेस पिछले वर्ष टूट गई जिसकी मरम्मत नहीं हो पाई। बिलीया माइनर पिछले 5-7 साल से अस्तित्व विहीन है। हर बार किसान खुदाई करवाकर अस्थायी कच्चे माइनर निर्माण से पानी ले जाने की मशक्कत करते हैं। इसके जल अपव्यय होने पर हर बार इस माइनर के किसान सिंचाई से वंचित रह जाते हैं।



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