ऐसे भी क्या समाज के नियम?
१. कतिपय समाजों में लडक़ी का पुनर्विवाह नहीं किया जाता, जबकि लडक़े का विवाह मान्य है।
२. कुछ समाजों में घूंघटप्रथा प्रचलित है। लड़कियों को आगे पंचायत में बोलने नहीं दिया जाता है।
३. विवाह बंधन बिगडऩे पर लडक़े पक्ष को पैसे देने का रिवाज बना रखा है।
४. मृत्युभोज करना सभी के लिए अनिवार्य है। चाहे कोई गरीब हो और खर्चा करने में सक्षम न हो तो भी समाज के डर से मजबूरन उसे मृत्युभोज करना पड़ता है।
५. महिलाओं को अपने पसंद का पति चुनने का हक नहीं है।
६. अन्तरजातीय विवाह पर पूर्ण पाबंदी।
७. पहनावे को लेकर समाज पाबंदियां लगा रहे हैं। महिला-पुरुष समाज के तय किए पहनावे को ही धारण करें।
८. लडक़े-लडक़ी का बाल-विवाह करवाना कई जाति-समाजों में अनिवार्य है।
९. विधवा को घर से बाहर नहीं निकलने देने के भी नियम बने हुए हैं।
१०. परिवारों पर पूर्ण पाबंदी लगाते हैं कि कोई भी मामला समाज ही निपटाएगा। अदालत की शरण लेने पर उसे मर्यादा से बाहर जाने का दोषारोपण कर प्रताडि़त किया जाता है।
कानून में से सब अपराध
झगड़ा राशि मांगना और दिलवाना, दहेज के लिए प्रताडि़त करना, बाल-विवाह, मृत्युभोज कानून के मुताबिक अपराधिक श्रेणी के कृत्य हैं, लेकिन कईसमाजों ने इन्हें प्रथाओं के आधार पर लागू कर रखा है।
कहता हैभारतीय कानून...
मृत्यु भोज : मृत्यु भोज निवारण अधिनियम-१९६० की धारा तीन में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति मृत्युभोज आयोजन नहीं करेगा, न ही उसमें शामिल होगा। नियम के उलंघन पर एक वर्ष की सजा का प्रावधान है। गांव के पंच, सरपंच, पटवारी एवं सरकारी नौकरशाह का कत्र्तव्य है कि वे इसकी सूचना पुलिस को दें।
विवाह : हिन्दू विवाह अधिनियम भारत की संसद द्वारा सन् 1955 में पारित एक कानून है। हिन्दू अल्पसंख्यक तथा अभिभावक अधिनियम-1956 ए और हिन्दू एडॉप्शन नियम हिन्दुओं की वैदिक परम्पराओं को आधुनिक बनाने के ध्येय से लागू किए गए। अब हर हिंदू स्त्री-पुरुष दूसरे हिंदू स्त्री-पुरुष से विवाह कर सकता है, चाहे वह किसी भी जाति का हो।
विशेष विवाह अधिनियम, 1954 में शासित है। इसके द्वारा विभिन्न धर्म के स्त्री-पुरुष नागरिक समारोह में एवं किसी भी जगह विवाह सम्पन्न कर सकते हैं। एक ही धर्म के स्त्री पुरुष भी रस्मों रिवाजों के बदले कोर्ट मैरिज कर सकते हैं।
जीवितों की अपेक्षा से मृतकों के अधिक निकट रहते है
परम्पराओं की जड़ें भारतीय संस्कृति में अभी भी लगी हुई है। लोगों की विचारधाराओं में परिवर्तन नहीं हो रहा है। वर्तमान परिपे्रक्ष्य में शिक्षा स्तर बढ़ा है और लोगों के विचारों केे साथ परम्पराएं टूट रही हैं, लेकिन सामाजिक कुरीतियों के खात्मे की गति बहुत धीमी है। लोगों में अभी भी कईपरम्पराओं में विश्वास है। कुछ लोग ऐसे गैर कानूनी नियमों का पक्ष लेते हैं। प्रसिद्ध समाजशास्त्री मेग डुगल ने कहा है कि लोग जीवितों की अपेक्षा से मृतकों के अधिक निकट रहते हैं। यह नजारा भारतीय समाज में भी देखने को मिलता है।
डॉ. इन्द्रसिंह चौहान, समाजशास्त्री, कांकरोली





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