धौलपुर। नेशनल हाइवे नंबर 3 पर राजस्थान व मप्र को जोडऩे वाली चंबल नदी व उसके पुल पर चंद सिक्कों के लिए बचपन जान से खेल रहा है। यहां पूर्व में भी कई हादसे हो चुके हैं। इसके बाबजूद ना तो बच्चों के परिजन इस ओर कोई ध्यान दे रहे हैं और ना ही पुलिस। पुल के इस तरफ राजस्थान व उस तरफ मप्र की पुलिस चौकी है। लेकिन दोनों में से किसी का भी ध्यान बच्चों की इस खतरनाक नादानी की तरफ नही है। इससे यहां बड़े हादसे की आशंकाएं बनी हुई हैं।
जानकारी के अनुसार ये बच्चे चंबल बीहड़ में स्थित नगर परिषद के क्षेत्र में आने वाले अति पिछले गांव राजघाट के हैं। इस गांव में पानी, बिजली, सड़क, रोटी, कपड़ा, रोजगार, शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। लोग जैसे तैसे कर के गरीबी की हालत में पेट भर रहे हैं। इस कारण इन्हीं परिवारों के बच्चे चंद सिक्कों के लालच में प्रतिदिन सुबह हाथ में चुम्बक बंधी डोर लेकर चंबल नदी व उसके पुल पर आ जाते हैं। ये नदी किनारे व नदी के पानी के बीच स्थित टापू पर बैठकर चुम्बक से पानी में सिक्के तलाश करते हैं। इसके अलावा कुछ बच्चे पुल पर रहते हैं। जो नदी में सिक्के डालने वालों पर निगाह रखते हैं और जब कोई सिक्का डालता है तो रेलिंग पर चढ़कर ये देखते हैं कि सिक्का नदी में किस जगह गिर रहा है। जहां ये नदी में चुम्बक से सिक्के खोजते हैं वहां बड़ी संख्या में घडिय़ाल रहते हैं। इस तरह ये बच्चे दिनभर जान को खतरे में डालते हैं।
आस्था ना ले बैठे किसी की जान
पुरानी मान्यता के अनुसार लोग किसी शुभ कार्य के लिए जाते वक्त चंबल नदी में सिक्का डालते हैं। लोगों का मानना है कि इससे कार्य सफल हो जाते हैं। इसी मान्यता के चलते लोग आस्था से नदी में सिक्का डालते हैं। इन्हें राजघाट गांव के बच्चे जान को खतरे में डालकर बीनते हैं। यह आस्था किसी की जान ना ले बैठे।
पूर्व में हो चुके हैं कई हादसे
चंबल नदी में पूर्व में कई हादसे हो चुके हैं। इनमें कई की जान जा चुकी है। करीब ढ़ाई साल पूर्व पुरानी सराय धौलपुर निवासी अमन, आरिफ, छोटू नहाने के लिए चंबल नदी में गए थे, जिनकी डूबने से मौत हो गई थी। ये तीनों नाबालिग थे। इसके अलावा अक्टूबर 2015 में प्रतिमा विसर्जन के दौरान राजघाट निवासी 45 वर्षीय रघुवीर को मगरमच्छ पानी में खींच ले गया था। इसके अलावा भी अब तक चंबल नदी में कई हादसे हो चुके हैं। लेकिन उसके बाद भी बच्चों की सुरक्षा को लेकर परिजन व पुलिस गंभीर नहीं है।
थोथे नजर आते हैं सरकार के विकास के दावे
राजघाट गांव के हालातों को देखकर अब तक की विभिन्न सरकारों के विकास के दावे थोथे नजर आते हैं। यहां लोग जैसे तैसे कर के पेट भर रहे हैं। पेट भरने के लिए कोई जंगल से लकड़ी काटकर व उन्हें बाजार में बेचकर घर के लिए राशन ला रहा है तो कोई तिहाड़ी मजदूरी कर के बच्चों का पेट पाल रहा है। यहां के एक दो लोगों के पास एकाद बीघा जमीन है, बाकी के सभी परिवार भूमिहीन हैं। गांव में करीब 45 परिवार निवास करते हैं।
मगरमच्छों के भय से गोताखोर भी कर देते हैं हाथ खड़े
चंबल नदी में बड़ी संख्या में मगरमच्छ हैं। जो अब तक कई लोगों की जान ले चुके हैं। ये इतने खतरनाक हैं कि गोताखोर भी इनकी वजह से नदी में उतरने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। कई हादसों के समय गोताखोरों ने यह कहते हुए नदी में उतरने से मना कर दिया है कि यहां मगरमच्छ हैं। लेकिन इन्हीं स्थानों पर टापूओं पर बच्चे जान को खतरे में डालकर सिक्के खोजने में लगे हैं।





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