प्रतापगढ़. जिले में संचालित निजी स्कूल स्कूल विभागीय अधिकारियों की अनदेखी का फायदा उठाते हुए अपनी मनमाफिक पाठ्यक्रम चला रहे हंै। जिससे अभिभावकों को आर्थिक संकट झेलना पड़ रहा है। इसको लेकर राजस्थान पत्रिका में 22 जून को ‘पाठ्यक्रम से परहेज, मान्यता से नहीं गुरेज’ शीर्षक से समाचार प्रकाशित कर जिम्मेदार अधिकारियों का ध्यानाकृर्षित कराया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए आखिर जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय की ओर से 2 जुलाई को संज्ञान लिया गया। जिले के राजस्थान शिक्षा बोर्ड से मान्यता प्राप्त हिन्दी एवं अंग्रेजी माध्यम के समस्त निजी विद्यालयों को शिक्षा विभाग के अनुसार निर्धारित पाठ्यक्रम संचालित करने के लिए आदेशित किया गया है।
जारी परिपत्र के अनुसार कोई भी निजी विद्यालय विभागीय पाठ्यक्रमानुसार ही अध्ययन कराएंगे तथा अभिभावकों को भी अन्य किसी पाठ्यक्रम की पुस्तकें लाने के लिए बाध्य नहीं करेंगे।
साथ ही यूनिफार्म एवं अन्य सामग्री स्टेशनरी आदि के लिए भी कम से कम पांच दुकानों नियत करने के लिए आदेश जारी हुए हंै।
परिपत्र अनुसार निर्देशों का उल्लघंन करते पाये जाने पर विभागीय नियमानुसाार कार्रवाईके निर्देश भी दिए हैं।
इस सत्र से पहले मण्डल की ओर से अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकें प्रकाशित नहीं करने से निजी विद्यालय अंग्रेजी माध्यम की भ्रम फैला कर निजी पब्लिशर्स की पुस्तकें धड़ल्ले से चला रहे थे। जबकि इस सत्र में पाठ्य पुस्तक मण्डल ने हिन्दी और अंग्रेजी दोनों माध्यम से कोर्स तैयार किया है।
क्यो करतेे हैं परहेज
पाठ्य पुस्तक मण्डल की पुस्तकों पर महज 15 फीसदी कमीशन दिया जाता है, जबकि निजी पब्लिशर्स की पुस्तकें चलाने पर विद्यालय को 50 से 60 फीसदी कमीशन मिलता है। जिसके चलते निजी विद्यालय निजी पब्लिशर्स एवं अपने विद्यालय के नाम छपी हुई पुस्तकें विद्यार्थियों को थोप कर मोटी कमाई करते हंै।
ये होगा फायदा
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का अनुमोदित एवं राजस्थान पाठ्यपुस्तक मण्डल की प्रकाशित पुस्तकों से सभी सरकारी और गैर सरकारी विद्यालयों में एक रूपता बनी रहेगी। मण्डल की ओर से इस सत्र में अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकें भी उपलब्ध कराई जा रही हैं। जो निजी पब्लिशर्स की तुलना काफी सस्ती है। इससे अभिभावकों की जेब पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा। अब तक निजी विद्यालयों ने शहर में एक दुकान निर्धारित कर रखी है जिस पर अमूक विद्यालय की अध्ययन सामग्री मिलती थी जिससे अभिभावकों को मजबूरी में मुंह मांगे दाम पर पुस्तकों के साथ बेमतलब की सामग्री थोपी जाती है।
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