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डॉक्टर ने कहा- बीमारी छिपाओ नहीं, बताई तो नौकरी से धोना पड़ा हाथ - मिर्गी से पीडि़त व्यक्ति से छिन गया ग्राम प्रत्याहारी का काम

राजसमंद. रोग से लडऩे की हिम्मत और प्रेरणा कभी उसकी रोजी-रोटी ही छीन लेगी, यह उसने कभी सोचा नहीं था। बीमारी से लडऩे और जीने का एक ही सहारा था, वह भी छिन गया।
केलवा निवासी रमेशचन्द्र लखारा (४८) पिछले बीस साल से मिर्गीरोग पीडि़त है। घर में कोई नहीं है। जिन्दगी और घर में सन्नाटा सा पसरा है। मां-बाप, पत्नी और परिवार के सभी सदस्य चल बसे। वह २० साल से ग्राम प्रत्याहारी पद पर काम कर रहा था। जब से बीमारी के बारे में उसे पता चला, नौकरी से बेदखल कर दिया गया। पहले बीमारी का किसी को उसने जिक्र नहीं किया था, तब बिना किसी समस्या के नौकरी चल रही थी। इलाज के दौरान चिकित्सकों ने सलाह दी थी कि बीमारी को कभी छिपाना नहीं चाहिए, बल्कि उसका सामना करना चाहिए। चिकित्सकों की सलाह पर उसने बीमारी साझा की, तो उसकी जिंदगी में मुश्किलों की बाढ़ सी आ गई।

नौकरी पर रखने को तैयार नहीं
वह ग्राम प्रत्याहारी पद पर कार्य कर रहा था, वहां से उसे हटा दिया गया। दूसरी जगह नौकरी की तलाश की, तो कुछ दिनों बाद ही उसके रोग के बारे में पता लगते ही वहां से भी उसे हटा दिया गया। उसने कई जगह काम की तलाश की, लेकिन उससे थोड़े ही दिनों में काम छीन लिया जाता।

न्याय की गुहार, कोई मदद नहीं
नौकरी और मजदूरी के अभाव में रमेश खुद के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ मुश्किल से कर पाता है। वह जिला मुख्यालय के रोजाना चक्कर काटता है कि उसे कहीं न्याय मिलेगा।

बकाया वेतन भी नहीं दिया
रमेश ने बताया कि उसे जितना दुख नौकरी से निकालने का हुआ, उससे ज्यादा दुख तब हुआ, जब उसे जिम्मेदारों ने पागल कहते हुए दो साल का बकाया वेतन देने से साफ इनकार कर दिया। जब वेतन लेने तहसील मुख्यालय गया तो उसे धक्के देकर बाहर निकाल दिया गया। उसे कहा गया कि कोई वेतन बाकी नहीं है।

कलक्टर से शिकायत भी बेकार
रमेश ने अपने बकाया वेतन को लेकर व अपनी बीमारी की वजह से हो रही परेशानी को लेकर कलक्टर को भी फरियाद दी, मगर कोई फायदा नहीं हुआ। अब उसका न्याय प्रणाली से धीरे-धीरे विश्वास उठने लगा है।

गैर कानूनी है
बीमारी के चलते किसी को नौकरी से निकालना व शोषण करना गैर कानूनी है। इस मामले में पीडि़त शिकायत कर सकता है। ऐसे मामलों में बोर्ड की अलग से बैठक होती है, जिसमें विशेषज्ञ चिकित्सक व अन्य अधिकारी ये फैसला करते है कि कार्मिक पूरी तरह फिट है या नहीं। फिट नहीं होने पर उसे सरकार सहायता प्रदान करती है।
डॉ. अनमोल पगारिया, चिकित्सक



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