राजसमंद. गरीब वार्डपंच मांगीलाल का पक्का घर बनाने का सपना उसके बेटे ने पूरा करने का वादा किया, मगर उसके वक्त से पहले चले जाने से मुमकिन न हुआ।
बेटे नारायण और किशन ने कभी मां का चेहरा नहीं देखा, न स्कूल का। आखर ज्ञान भी नहीं पाया कि जिम्मेदारियां सिर पर आ गई। मांगीलाल ने बताया कि एक बार ग्रामीणों व सरपंच ने तंबू की जगह लोहे के चद्दर और ईंटों की दीवार बनाने की पेशकश की, लेकिन पक्का घर बनाने की मन में ठाने बैठे छोटे बेटे नारायण ने मदद लेने से इनकार कर दिया था। उसने कहा था, मुझे मेरे पिता के लिए एक पक्का मकान बनाना है। चाहे कोई मदद करें या न करें। बेटे का यह सपना पूरा होने से पहले 'कालÓ ने उसे निगल लिया।
मजदूरी का फैसला
विकलांग पिता मांगीलाल कठिन काम नहीं कर पाता था। पक्के मकान का सपना लेकर चल रहे दोनों ने मजदूरी करने का फैसला किया। दोनों लोग गांव के ही एक ट्रैक्टर मालिक के यहां काम करने लगे। दिन-रात मेहनत की। थोड़े-थोड़े पैसे जमा किए। कुछ समय बाद बीमार पडऩे पर नारायण को मांगीलाल हॉस्पिटल ले गया। वहां भूख और अत्यधिक काम करने से कमजोरी को बीमारी का कारण बताया। दोनों दो माह में चल बसे।
आसपास बीपीएल के दर्जनों मकान
मांगीलाल ने बताया कि आसपास दर्जनों मकान अवैध हैं, जिनके पास कोई पट्टे नहीं है। सरकार की योजना व बीपीएल श्रेणी में उनके मकान बन गए। वह इन सबके बीच में रहता है। फिर भी उसका मकान नहीं बन पाया। उसके साथ हो रहे इस बर्ताव पर वह हैरत में है।
छह सौ वर्गफीट में बन सकता है घर
दलित आदिवासी एवं घुमन्तू अधिकार अभियान के जिला संयोजक सोहनलाल भाटी ने कलक्टर को ज्ञापन सौंप बताया कि सरकारी दावों के विरुद्ध एक घर से वंचित वार्डपंच की दयनीय स्थिति है, तो आम दलित वर्ग के लोगों के हालात क्या होंगे? उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार किसी भी किस्म की छह सौ वर्गफीट जमीन पर आवास निर्माण किया जा सकता है, लेकिन इस प्रकार बेदखली नहीं की जा सकती। उन्होंने मांगीलाल के लिए न्याय की गुहार लगाई।
प्रस्ताव भेज रखा है
उसकी भूमि चरागाह में है। मकान तो स्वीकृत है, लेकिन भूमि के अभाव में नहीं बन पा रहा। आवंटन का प्रस्ताव भेज रखा है। चरनोट और चरागाह में बने मकान-२०१५ के हंै। अब सरकार द्वारा जियो टे्रकिंग होने से समस्या आ रही है।
बाबूलाल खारोल, सरपंच, राज्यावास





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