करोड़ों लगाए फिर भी मिट गया नाम
विजय महर्षि/श्रीडूंगरगढ़. भले ही चार दशक पूर्व यहां के सेठ साहुकारों ने ग्रामीण एवं शहरी बच्चों को सुलभ एवं उच्च शिक्षा के लिए अपनी बेशकीमती जमीन पर बहुमंजिल इमारतों का निर्माण कर सरकार को सौंप दिया हो लेकिन आज उनके नाम से बने सरकारी विद्यालयों से उनका नाम ही मिट गया है। आज इन भवनों में विद्यालय एवं महाविद्यालय संचालित हो रहे हैं, लेकिन खून पसीने की गाढ़ी कमाई से इन भवनों का निर्माण करवाने वाले दानदाताओं का कहीं नाम नहीं रहा है।
इस कस्बे के बिग्गा बास मोहल्ले में बालचन्द डागा परिवार ने चारों तरफ गलियों को जोड़ती अपनी चार पट्टा जमीन पर भवन का निर्माण कर विद्यालय के लिए यह सरकार को दान कर दिया। वहीं इसी मोहल्ले में बालिका शिक्षा का महत्व समझते हुए सरकारी भूमि पर विद्यालय भवन का निर्माण करवाया गया। यहां छात्र एवं छात्राओं के लिए अलग अलग बने इन दो मंजिलें भवनों में कक्षा एक से आठ तक की स्कूलों का संचालन राज्य सरकार ने राजकीय डागा उच्च प्राथमिक छात्र एवं राजकीय डागा राधादेवी जमना देवी बालिका उप्रा विद्यालय के नाम से शुरू कर दिए। इन विद्यालयों का दानदाताओं के नाम से संचालन लगातार चालीस साल तक होता रहा लेकिन पिछले दो वर्ष पूर्व में विद्यालय के मर्ज के तहत इन विद्यालयों के बच्चों को अन्य विद्यालयों में स्थानान्तरित कर दिया गया। इससे ये विद्यालय अपना पुराना अस्तित्व खोने लगे है।
ये थी सुविधाएं
इन स्कूलों में विशाल भवन, खेल मैदान जैसी कई अन्य सुविधाएं बच्चों के लिए मुहैया करवाई गई थी। कस्बे के अलावा आस-पास के गांवों से भी छात्र-छात्राएं बड़ी तादाद में अध्ययन करने के लिए आते थे। दो-तीन दशक तक तो सब कुछ ठीक चला, लेकिन एक दशक पूर्व निजी स्कूलों की आई बाढ़ में ये विद्यालय भी चपेट में आ गए और धीरे धीरे शिक्षा विभाग की शिथिलता से छात्र -छात्राओं की संख्या का ग्राफ घटता गया। हालांकि यहां एक भवन में विद्यालय व दूसरे में महाविद्यालय का संचालन जरूर किया जा रहा है, लेकिन इनमें दानदाताओं के नाम का कोई सरोकार नहीं रहा है।
अन्य विद्यालय हो गया शिफ्ट
यहां आडसर बास में संचालित राउप्रा विद्यालय में स्थानाभाव होने के कारण शिक्षा विभाग ने इसी भवन में शिफ्ट कर दिया। इसी तरह इसी सत्र में शुरू हुए सरकारी महाविद्यालय भी भवन के अभाव में डागा विद्यालय में शुरू किया है।
करोड़ों की जमीन एवं भवन बनाए
इस विद्यालय की जमीन एवं भवन की कीमत आंकी जाए तो करोड़ों में होगी। आठवीं तक के विद्यालय का भवन दूरगामी सोच के साथ बनाया गया था। आज एक सरकारी महाविद्यालय के लिए भी इतना बड़ा भवन बनाना बूते से बाहर है।
नाम से संचालित हो
दानदाताओं द्वारा बनाए गए भवनों में संचालित हो रहे सरकारी विद्यालयों में अभी चल रहे अन्य स्कूल एवं कॉलेज का नाम भी इन्हीं दानदाताओं के नाम से संचालित हो ताकि भामाशाहों द्वारा लगाई गई राशि का उपयोग हो और अन्य दानदाताओं का मनोबल भी बना रहे। वरना आने वाले समय में इस तरह सरकार का सहयोग करने वाला कोई भी दानदाता आगे नहीं आएगा।
हुलास सिखवाल, व्यवस्थापक डागा ट्रस्ट, श्रीडूंगरगढ़





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