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जगन्नाथ महोत्सव : भगवान जगन्नाथ मंदिर का अलवर से है बेहद अनूठा रिश्ता, यहां जानें मंदिर का इतिहास

अलवर. राजस्थान पत्रिका व जगन्नाथ मेला कमेटी की ओर से 17 जुलाई को अपना अलवर अपनी संस्कृति के तहत भगवान जगन्नाथ के जीवन दर्शन और मेले से संबंधित प्रश्नों पर प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। इसके लिए पत्रिका मेंं प्रतिदिन सामग्री प्रकाशित की जाएगी। यह प्रतियोगिता नयाबास स्थित बीएल पब्लिक स्कूल में आयोजित की जाएगी। यह प्रतियोगिता पूरी तरह से निशुल्क होगी। इसमें सीनियर वर्ग में कक्षा 9 से 12 वीं तक तथा जूनियर वर्ग में कक्षा 6 से 8 वीं तक के विद्यार्थी भाग ले सकते हैं। प्रतियोगिता में भाग लेने वाले सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र दिए जाएंगे।

इंद्रविमान रथ को पहले हाथी खींचते थे

प्रतिवर्ष निकलने वाली जगन्नाथ रथयात्रा में इंद्र विमान रथ का प्रयोग किया जाता है। पहले इस रथ को चार हाथी खींचते थे। लेकिन अब कुछ सालों से ट्रैक्टर से रथ को खींचा जाने लगा है। रथयात्रा में प्रयोग आने वाले टै्रक्टर की पहले से ही बुकिंग हो जाती है। इतिहासकार हरिशंकर गोयल बताते हैं कि भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा में काम में आने वाले इंद्र विमान रथ का तिजारा ( अलवर ) के महाराजा बलवंतसिंह की ओर से 1826 से 1845 तक तिजारा में राजकीय सवारी में प्रयोग होता था। इसमें दो मंजिलें बनी हुई है।

पहली मंजिल में प्रमुख लोगों के बैठने की जगह होती है और काम आने वाली आवश्यक सामग्री रखी जाती है। दूसरी मंजिल पर यानी ऊपर की तरफ महाराजा बलवंत सिंह स्वयं विराजते थे। लाल मखमल के चौकोर गद्दे और उस पर सुर्ख मखमल की मसंद लगाई जाती थी। ऊपरी भाग को झालरों से सजाया जाता है। झीने पर्दो से सजे हुए इंद्र विमान की छतें तीन गोल गुंबज के रूप में बांटी गई हैं। रथ में ऊपर जाने के लिए पहली और दूसरी मंजिल पर सीढियां भी बनी हुई हैं। इंद्र विमान में हाथियों को हांकने वाले महावतों के स्थान भी बने हुए हैं। अलवर रियासत के पूर्व महाराज जयसिंह के समय से पहले इंद्र विमान त्रिपोलिया का चारों तरफ चक्कर लगाकर शहर महल को जाता था।

तिजारा महाराजा बलवंत सिंह के निसंतान स्वर्गवासी होने पर तिजारा अलवर राज्य में विलय कर दिया गया। तिजारा राज्य 1826 से 1845 तक रहा। 1826 से पहले व 1845 के बाद अलवर का हिस्सा रहा। तब तिजारा से भवानी तोप व इंद्र विमान को अलवर लाया गया। अलवर में इंद्र विमान के आने पर इसमें महाराजा विनय सिंह (तीसरे ) श्योदान सिंह, मंगल सिंह तथा जयसिंह के राजशाही सवारी के काम आता था। गोयल बताते हैं कि इंद्र विमान त्रिपोलिया की परिक्रमा करके अपने स्वामियों की सवारी शहर महल में पहुंचाता था। बाद मेंं इंद्र विमान को निकालने के लिए त्रिपोलिया में तीन और द्वार बनाए गए।



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