बगड़ (झुंझुनूं) . जयपहाड़ी फौजियों के गांव के नाम से मशहूर है। यहां बचपन से युवा सेना में जाने की तैयारियों में जुट जाते है। गांव के औसतन प्रत्येक घर से एक फौजी मिल जाएगा। जहां एक ओर भारतीय सेना में झुन्झुनू जिले ने अपनी एक अलग पहचान बना रखी है। वहीं झुंझुनंू से महज 17 किलोमीटर की दूरी पर स्थित जयपहाड़ी गांव की बसावट आज से कई सौ साल पहले हुई थी।
गांव के पूर्व सैनिक यूनिस खां पठान गांव की बसावट के बारे में बताते है कि करीब सात सौ साल पहले मुगलकाल के तत्कालीन नवाब यूनिस खां नागड़ पठान की ***** जिया बाई के नाम पर गांव का नाम रखा गया। जब नरहड़ में राजपूतों का शासन हुआ करता था उस समय यूनिस खां पठान ने नरहड़ पर चार पांच बार आक्रमण कर फतह हासिल की।
तब यूनिस खां ने अपने बच्चों के नाम पर आस-पास के गांवों की जागीर के नाम रखे। जैसे ईस्माइल खां के नाम ईस्माइलपुर, काले खां के नाम पर कालीपहाड़ी, अली खां के नाम पर अलीपुर तथा अपनी बेटी जिया बाई के नाम पर जयपहाड़ी का नाम रखा।
वही प्रमेंद्र सिंह शेखावत सहित कुछ लोगों का मानना है कि करीब चार सौ साल पहले बगड़ के तत्कालिन नवाब ने अपनी बेटी जया बीबी के नाम पर जयपहाड़ी गांव का नाम रखा। उस समय नवाब ने अपनी बेटी को पहाड़ी की तलहटी में बसाया था। गांव में मुख्य रूप से भारतीय सेना में सर्वाधिक सेनिक है। लगभग छह सौ घरों की बस्ती वाले इस गांव की आबादी करीब छह हजार है। बगड़ नजदीक होने से यह गांव शिक्षा में अव्वल रहा है।
सेना में जाने की रहती होड़
जयपहाड़ी में युवा सेना में जाने के लिए हर रोज सुबह मेहनत करते दिखाई दे देंगें। जयपहाड़ी के सेनानियों ने सेना में अपना जलवा दिखाने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। बात चाहे प्रथम विश्व युद्ध की हो या दूसरे विश्व युद्ध की या फिर 1999 में हुए करगिल युद्ध में भी गांव के लाडले शहीद जगदीश सिंह शेखावत ने अपने प्राणों को देश की रक्षा के लिए न्यौछावर कर दिया। गांव में लगभग प्रत्येक घर से कोई ना कोई सेना में अपनी सेवा देता मिल जाएगा।
जयपहाड़ी के पत्थर है प्रसिद्ध
जयपहाड़ी में स्थित पहाड़ के पत्थर दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। इस पहाड़ के पत्थरों के हजारों साल तक दीमक नहीं लगती और न ही ये भूर-भुराकर टूटता है। इसी कारण से इस पत्थर की मांग रहती है।
सेना से सेवानिवृत्ति के बाद करते खेती
इस गांव के लोग सेना में सेवा देने के बाद सेवानिवृत्त होकर खेती करते है। खेती में विभिन्न फसलों के साथ-साथ पशुपालन भी करते है।
इनका कहना है-
करीब सात सौ साल पहले जिया बाई के नाम पर जयपहाड़ी गांव का नाम पड़ा था। यहा के जवानों ने सेना में रहते हुए प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध सहित देश की अन्य लड़ाईयों में देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया है।
- यूनिस खां पठान, पूर्व सैनिक
यहां के युवा सेना में जाने के लिए हर रोज सुबह-सुबह तैयारी करते है। पूर्व सैनिक भी युवाओं की डिफेंस के लिए मदद करते है।
-महेश सिंह, पूर्व सैनिक
हमारे पूर्वजों से सुना था कि करीब चार सौ साल पहले बगड़ के नवाब ने अपनी बेटी जया बीबी को पहाड़ी की तलहटी में बसाया था। उसी के नाम पर जयपहाड़ी का नाम रखा गया। यहां के जवान सेना में उच्च पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके है।
-प्रमेंद्रसिंह शेखावत, ग्रामीण





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