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1857 के गदर का सिरमौर रहा है आउवा गांव, एजेंट मैक मैसन का काट डाला था सिर

जयेश दवे
आउवा। सन 1857 में मंगल पाण्डे ने सैन्य विद्रोह की ज्वाला जलाई। वह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतभर में ज्वालामुखी बनकर फूटी। इस ज्वालामुखी की आंच राजस्थान के एरनपुरा और नसीराबाद छावनी तक पहुंची थी। यहां सैन्य विद्रोह करने वाले सैनिकों को शरण देने वाला मारवाड़ रिसायत का आऊवा गांव इस गदर का चश्मदीद गवाह बना।

आऊवा के ठाकुर कुशालसिंह चांपावत के नेतृत्व में आसोप, आलनियावास और गूलर आदि ठिकानों और विद्रोही सैनिकों ने मिलकर जोधपुर राज्य और फिरंगियों की संयुक्त फौज के जिस प्रकार छक्के छुड़ाए, उसका वृत्तांत इतिहास के पन्नों पर स्वर्णिम अक्षरों में लिखने योग्य है। हालांकि शिक्षा विभाग राजस्थान ने इस वर्ष परिवर्तित नए पाठ्यक्रम के अंतर्गत आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में पहली बार गदर के इस गांव पर कुछ प्रकाश डालने का प्रयास किया है।

सन् 1857 में पूरे देश की तरह राजपूताना की एरनपुरा छावनी में सैनिक विद्रोह हुआ। बागियों ने छावनी में भरपूर लूटपाट की और मारकाट मचाई। वहां से चलकर ये सभी सैनिक पाली जिले के मारवाड़ जंक्शन रेलवे स्टेशन के पास स्थित आऊवा गांव पहुंचे। अंग्रेजों से अदावत रखने वाले आऊवा ठाकुर कुशालसिंह चांपावत इन बागी सैनिकों को अपने यहां शरण देने में तनिक भी नहीं हिचकिचाए। इस बात से बेहद नाराज अंग्रेज अफसरों ने मारवाड़ रियासत के तत्कालीन महाराजा तखतसिंह से आऊवा के विद्रोह को कुचलने के लिए कहा।

आऊवा में बागी सिपाहियों के एकत्र होने का पता चलते ही मारवाड़ महाराजा तखतसिंह ने अपने किलेदार अनाड़सिंह को फौजी दस्ते के साथ दीवान कुशलराज सिंघवी की मदद के लिए रवाना किया। कुशलराज ब्यावर के रास्ते पर पहले से फौजी दस्ते के साथ मुश्तैद था। इधर, आऊवा के किले की किलाबंदी जबर्दस्त थी। बाहर की तरफ कच्चा परकोटा और अंदर की तरफ दूसरा पक्का परकोटा। अनाड़सिंह और कुशलराज आऊवा के पास ही बिठूड़ा गांव में डेरा डाले हुए थे।

किलेदार अनाड़सिंह की यह मंशा थी कि किसी प्रकार आऊवा की फौज किले से बाहर आ जाए। क्योंकि बाहर से तोपों द्वारा दागे जाने वाले गोले कच्चे परकोटे में धंसकर रह जाते थे। अनाड़ सिंह अंग्रेजी एजेंट सर हेनरी लारेंस की शिकायतों से आऊवा पर खार खाए हुए था। इसलिए 7 सितंबर 1857 को उसने अलसुबह ही आऊवा पर धावा बोल दिया। लेकिन इससे कुछ हासिल नहीं हुआ और अपनी ही फौज के 10 सैनिक गंवा बैठा। अनाड़सिंह ने अगले दिन 8 सितंबर को दुबारा हमला करने की ठानी। इसी बीच लेफ्टिनेंट हेचकेट 500 घुड़सवारों के साथ अनाड़सिंह की मदद के लिए आ पहुंचा। दोपहर बाद आक्रमण किया गया, परंतु आऊवा के किले पर लगी तोपों का मुकाबला नहीं हो सका। रात्रि को लड़ाई रुक गई।

लेकिन आऊवा की फौज के सैनिकों ने रात्रि में ही अचानक जोधपुर और फिरंगियों की संयुक्त सेना पर ऐसा धावा बोला कि सारी सेना बिखर गई। कुशलराज और हेचकेट मौका देखकर भाग छूटे। जोधपुर का किलेदार अनाड़सिंह अपने कुछ भरोसेमंद सैनिकों के साथ लड़ता रहा और अंतत: मारा गया। जोधपुर की सेना की इस हार से सर हेनरी लारेंस को गहरा धक्का लगा। उसने ब्यावर से एक फौजी दस्ते के साथ आऊवा की तरफ कूच किया। 18 सितंबर 1857 को वह आऊवा पहुंचा। आऊवा गढ़ की तोपों से गोले छूटने लगे। तीन घंटे तक घमासान मचा।

इसी बीच एक ऐतिहासिक घटना घट गई। जोधपुर रियासत का पॉलिटिकल एजेंट मैक मैसन, लारेंस से मिलने जोधपुर से सीधा युद्धभूमि में आया और गफलत में आऊवा की सेना के बीच में पहुंच कर मारा गया। आऊवा में एकत्र बागी सिपाहियों ने उसका सर कलम कर दिया और बरछी में पिरोकर पहले तो पूरे गांव में घुमाया और फिर किले के दरवाजे पर टांग दिया।

जोधपुर और फिरंगियों को दो बार मिली करारी हार से मारवाड़ नरेश आश्चर्य में पड़ गए। बाद में ले. कर्नल होम्स की अगुवाई में पहुंची इस सेना में 700 घुड़सवार एवं 1100 पैदल सैनिक और कुछ इंजीनियर भी थे। अंग्रेज सेना ने आऊवा पर हमला कर दिया। ठाकुर खुशालसिंह यहां से मेवाड़ की तरफ निकल गए। बाद में उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। 1863 में उदयपुर में उनका देहांत हो गया। आज भी ठाकुर खुशालसिंह का नाम गर्व से लिया जाता है।



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