हरीश पाराशर
भ गवान घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की नगरी शिवाड़ में आने वाले श्रद्धालुओं के देखने के लिए और भी प्राचीन देवालय है। अचरज की बात यह है कि कस्बे के मध्य में कल्याण जी के मंदिर के नाम से विख्यात इस मंदिर के मुख्य गर्भ गृह में वेदी पर प्रतिमा राधा -कृष्ण की विराजमान है। डिग्गी के कल्याण धणी की तरह शंख, पद्म, गदाधारी विष्णु की प्रतिमा गर्भगृह में ही अलग से विराजमान है। डिग्गी की तरह शिवाड़ की प्रतिमा भी एकल है अर्थात लक्ष्मी जी के बिना। फर्क सिर्फ इतना ही है कि डिग्गी में प्रतिमा श्वेत पाषाण की है और यह श्याम पाषाण की।
शिवाड़ के इतिहास में रुचि रखने वाले घुश्मेश्वर मंदिर ट्रस्ट शिवाड़ के पदाधिकारी पं. पुरुषोत्तम शर्मा बताते हैं कि यह मंदिर चन्द्रपभु दिगम्बर जैन मंदिर से भी पुराना है। मंदिर इस हिसाब से पांच सौ साल से भी पुराना होना चाहिए। माना जा रहा है कि पूर्व में यह कल्याणजी का मंदिर ही था। जिन जैन मतावलंबी सज्जन ने जैन मंदिर बनवाने में योगदान दिया उनकी वैष्णव मतावलंबी पत्नी ने यहां कल्याण मंदिर में जीर्णोद्धार का काम शुरू कराया। तब यहां मुख्य वेदी पर राधा-कृष्ण की प्रतिमा स्थापित की गई होगी। बताते हैं कि जैन मतावलंबी पति ने अपनी पत्नी की इच्छा के मुताबिक जैन मंदिर के साथ-साथ कल्याण जी के इस मंदिर के पुनर्निमाण में दिल खोल कर सहयोग किया।
शुरू के सालों में यह मंदिर कच्चे-पक्के ढांचे में था। साठ-सत्तर के दशक में यहां विख्यात संत कृष्णानंद जी महाराज का आगमन हुआ था। उन्होंने यहां लोगों को एकत्र कर मंदिर का जीर्णाद्धार करने को कहा। वर्ष 1950 में यहां रामधुनी व गीता पाठ की शुरुआत हुई जो प्रतिदिन आज भी जारी है। यहीं स्वामी जी ने शिव सत्संग भवन स्थापित किया। शिवाड़ के दूसरे छोर पर अब अलग से सत्संग भवन भी बन गया है।
करीब चालीस बरस पूर्व तक मंदिर परिसर में दुकानों व दफ्तर की जगह समेत काफी निर्माण कार्य हो चुका था। आजादी से पहले अपने भवन के अभाव में शिवाड का पहला सरकारी प्राइमरी स्कूल इसी परिसर में चलता था।





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