READ : गलत काम करने से सास ने किया मना तो बहू हो गई तैयार, हर माह की कमाई 2 लाख रुपए
जी हां, कभी घूंघट की ओट में चेहरा छिपा कर रखने वाली यह बहू इस बार विदेशी धरती पर खेल के मैदान पर उतरेगी। अपनी प्रतिभा के हुनर को दिखाने के लिए बेताब कूदन की सुमन एक पैर से दिव्यांग है। लेकिन, गोला फेंक और तस्तरी फेंक में इनका कोई सानी नहीं है। खेल में सामान्य खिलाडिय़ों से भी कहीं बढ़कर जज्बा होने पर इनका चयन जकार्ता में होने वाले एशियन गेम में किया गया है।
बानगी यह है कि कम पढ़े लिखे नहीं होने पर पति महेंद्र खेती करते हैं तो सुमन खेल मैदान पर मेडल बटोर में जुटी है। जिद और जूनून के बलबूते दिव्यांगता को मात देने वाली सुमन को अपनी काबलियत पर भरोसा है। उसका मानना है कि गांव की बहू होने के नाते ससुराल वालों को वह मेडल का तमगा देना चाहती है। ताकि बहू के रूप में वह गांव की बेटियों का मान भी बढ़ा सके।
दुबई में जीता कांस्य पदक
एक हादसे में पैर गंवाने के बाद सुमन मायूस हो गई थी। इसके बाद दिव्यांग देवर महेश नेहरा ने सुमन को खेल से जोड़ा। जीत की शुरूआत जिला स्तर पर हुई। इसके बाद सुमन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और राज्य, राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी दुबई में आयोजित फाजा इंटरनेशनल पेरा चैंपियनशिप में तस्तरी फेंक में कांस्य पदक पर कब्जा जमाने के साथ गोला फेंक में सातवां स्थान प्राप्त किया। इसके अलावा बीजिंग चायना में हुई चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली सुमन अब-तक पेरालंपिक में 25 गोल्ड, राज्य स्तर पर 15 गोल्ड व राष्ट्रीय स्तर पर 14 पदकों पर कब्जा जमा चुकी है।
पांच घंटे अभ्यास कर बहाती है पसीना
सुमन रोजाना पांच घंटे कोच जयवीर सिंह शेखावत की देखरेख में खेल मैदान पर पसीना बहाकर गोला व तस्तरी फेंक का अभ्यास कर रही है। 22 अगस्त को गुजरात गांधी नगर में शुरू होने वाले इंडियन केंप में शामिल होगी। इसके बाद यहां खेल की बारिकियां सीखकर अक्टूबर में जकार्ता (इंडोनेशिया) के लिए रवाना हो जाएगी। सुमन के पिता रामलाल के अनुसार उसकी तीन बेटियां हैं। लेकिन, खिलाड़ी के तौर पर सुमन जैसी बेटी पाने के बाद उसने कभी बेटे की कमी महसूस नहीं होने दी।





No comments:
Post a Comment