चित्तौडग़ढ़.प्रसूता और नवजात को घर भेजने की जिम्मेदारी भले ही सरकार ने ले रखी है। इसके लिए सरकार ने जननी सुरक्षा योजना संचालित कर रखी है लेकिन जिम्मेदारों द्वारा इस योजना में रूचि नहीं दिखाने से जननी को घर पहुंचने से पहले कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
कुछ ऐसे ही हालात सोमवार को शिशु एवं महिला बाल चिकित्सालय में देखने को मिले। वार्ड इंचार्ज द्वारा सुबह प्रसुता के परिजनों को डिस्चार्ज टिकट दे दिए गए उसके बाद परिजन जननी सुरक्षा योजना कक्ष में अपना पंजीयन कराने पर उनको गाड़ी नम्बर दे दिए गए। कई घंटों के इंतजार के बाद गाड़ी का पता चला तब तक उसमें तेल ही खत्म हो चुका था। कुछ ऐसे ही बिजयपुर की प्रसुता लीला सुथार, बस्सी क्षेत्र के बल्दरखा की प्रसुता के साथ। इनको जो गाड़ी दी गई उसमें तेल खत्म हो गया था। उसके बाद अन्य गाड़ी से प्रसुताओं को भेजा गया। गाड़ी के चालक ने बताया कि गाड़ी में तेल खत्म हो गया था जिससे में तेल के रुपए लेकर आया हूं। वहीं राशमी क्षेत्र के रेवाड़ा की प्रसुता लीला सुथार को जो गाडी नंबर दिए जो वो गाड़ी सोमवार छह बजे तक भी नहीं लौटी थी क्योंकि वो कपासन क्षेत्र में प्रसुताओं को छोडऩे गई थी।
चार घंटे तक होती है एंट्री
जननी नि:शुल्क परिवहन सेवा कार्यालय में सुबह १० से २ बजे तक एंट्री की जाती है। प्रसुताओ को घर भेजने का काम सुबह १० से ५ बजे तक होता है। एक वाहन में दो प्रसुताओं को ले जाया जाता है। कई बार किसी रुट पर दूसरी प्रसुता नहीं मिलती है तो घंटो तक पहली प्रसुता वाहन के इंतजार में वहीं बैठाए रखी जाती है।
डिस्चार्ज होने वालों की तुलना में गाडिय़ां बहुत कम
शिशु एवं महिला बाल चिकित्सालय में सामान्यत लगभग २५-३० प्रसुताओं को डिस्चार्ज किया जाता है। नि:शुल्क जननी परिवहन सेवा के इंचार्ज दिनेश चतुर्वेदी ने बताया कि वर्तमान में जननी योजना के तहत पांच-छह गाडिय़ां की चल रही है। उन्हें से भी दो गाड़ी सोमवार को खराब हो गई थी। गाडिय़ों के टैंडर के लिए कई बार उच्च अधिकारियों को अवगत कराया गया है लेकिन अभी टैंडर नहीं किया गया।इससे प्रतिदिन प्रत्येक से तीन चक्कर कराने पड़ रहे है। उन्होंने बताया कि दो माह से बिल भी पास नहीं होने से परेशानी हो रही है।
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जिम्मेदारी गाड़ी मालिक की
गाड़ी में तेल खत्म हो गया तो इसकी जिम्मेदारी गाड़ी मालिक की है। टैंडर के लिए अपने विज्ञापन भी जारी कर रखा हैलेकिन कोई रूचि नहीं दिखा रहे है। इसलिए अभी मौजूद गाडिय़ों से ही काम चलना पड़ रहा है।
-डॉ. मधुप बक्षी, प्रमुख चिकित्सा अधिकारी





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