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शिवाड़ दर्शन: चोर उठा ले गए थे प्रतिमा भक्त को स्वप्न में बताया

हरीश पाराशर
भगवान घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के साथ-साथ शिवाड़ में भगवान चन्द्रप्रभु के मंदिर की भी विशद मान्यता है। यहां करीब साठ जैन परिवार रहते हैं। मंदिर को करीब पांच सौ साल पुराना बताया जा रहा है। मंदिर में मूल प्रतिमा चन्द्रप्रभु भगवान की है। इसके अलावा मंदिर में 9 वेदियां हैं। साथ ही 150 धातु व पाषाण की दूसरी प्रतिमाएं भी इस मंदिर में प्रतिष्ठापित की गई है।


चन्द्रप्रभु भगवान की इस दिव्य प्रतिमा को लेकर एक रोचक जानकारी मंदिर के बारे में तथ्य जुटाने के दौरान हासिल हुई। पुराने लोग बताते हैं कि देश की आजादी के पहले वर्ष 1932 में पीतल की इस प्रतिमा को सोने की समझकर चोर उठा ले गए थे। चारों को बाद में प्रतिमा के सोने की न होने का पता चला तो वे समीप ही बनास नदी के पेटे में प्रतिमा को दबा गए।


ग्रामीणों ने तलाश की लेकिन चोरी का सुराग नहीं मिला। किसी भक्त को चन्द्रप्रभु ने स्वप्र में प्रतिमा के नदी के पेटे दबे होने का संकेत दिया। दबी प्रतिमा को निकाल इस प्रतिमा की पुन: विधिवत प्रतिष्ठा की गई। शिवाड़ में यह इकलौता जैेन मंदिर है। मंदिर से सटी ही एक धर्मशाला लंबे समय से सार्वजनिक कार्यों में सबके लिए उपलब्ध है। मंदिर के पिछवाड़े स्थित इस धर्मशाला के मैदान में रामलीला व अन्य धार्मिक नाटकों का आयोजन हुआ करता था। महावीर जयंती पर हर साल यहां भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है


चन्द्रप्रभु के मंदिर में प्रवेश द्वार भी काफी ऊंचाई पर है। मंदिर के दोनों तरफ सीढिय़ां हैं जिनके जरिए मुख्य मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। पिछले सालों में मंदिर का विस्तार भी हुआ है। अचरज की बात यह है कि पिछड़े समझे इस इलाके के मंदिर मेंंं भी वर्षों पहले दीवारों पर कांच की नक्काशी का काम हो गया था। आम तौर पर शहरी इलाकों के मंदिरों में ही ऐसा बारीक काम नजर आता है।


उल्लेख करने योग्य बात यह भी है कि घुश्मेश्वर महादेव मंदिर को मौजूदा स्वरूप में लाने का श्रेय भी यहां के प्रमुख कारोबारी माणक चंद जी जैन को है। वे मंदिर ट्रस्ट के वे लंबे समय तक अध्यक्ष रहे। जैन समुदाय के प्रतिष्ठित लोग आज भी घुश्मेश्वर मंदिर से जुड़े हैं।



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