सोनम राणावत / अजमेर. ठान लो अगर कुछ कर दिखाने की तो हर मुश्किल आसान लगती है। अजमेर की किरण का जज्बा भी कुछ ऐसा ही है। खुद का बचपन अभावों में बीता। पढऩे लिखने के लिए स्कूल की फीस के पैसे भी पिता ब्याज पर लेकर मुश्किल से जुटा पाते थे। दो वक्त के खाने के लिए भी दूसरों पर निर्भर होना पड़ता था। आज वही किरण पढ़ लिखकर गरीब और असहाय लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन चुकी है।
स्कूल के बाद टयूशन देकर और पिता की सैलेरी के बलबूते हाल ही में सोफिया से ग्रेज्यूएशन कर चुकी किरण बेसहारा व आदिवासी तबके के बच्चों के लिए भगवान से कम नहीं। अजमेर के पास स्थित बंद्या गांव की रहने वाली इक्कीस वर्षीय किरण रावत के मन में दया का भाव इस कदर है कि वह नि:स्वार्थ भाव अपने घर में पाठशाला लगाकर इन गरीब बच्चों को पढ़ाने लिखाने के साथ ही उन्हें कला कौशल सिखा रही हंै। इतना ही नहीं भलाई के इस काम में किरण का पूरा परिवार उनका सहयोग करता है।
सोशल साइट्स से मिलता सहयोग
किरण ने बताया कि सोशल नेटवर्किंग साइट की ताकत मेरे लिए वरदान साबित हुई है। इन सोशल साइट्स के कारण राजस्थान ही नहीं अन्य राज्यों के तकरीबन एक लाख से अधिक लोग मुझसे जुड़ें हैं। गरीब बच्चों की सहायता के लिए किताब, कॉपी, पेन के साथ ही पुराने कपड़े इत्यादि इन साइट्स के माध्ययम से मुझे मिल पाता है जो मैं इन बच्चों तक पहुंचाती हूं।
जो खुद को नहीं मिला दूसरों को देने की चाहत
किरण का कहना है कि वह अपने माता पिता की इकलौती बेटी है उससे बड़े दो भाई है। घर में पिता अकेले कमाने वाले थे जिनकी आय तकरीबन दस से बारह हजार रुपए अब हुई है। इसके चलते हम बच्चों का जीवन अभावों में बीता। ऐसा किसी और के साथ न हो इसी उद्देश्य से मैं असहाय बच्चों को शिक्षा देकर अपने शिक्षित होने का फर्ज निभाना रही हूं।
असहाय बच्चों के अलावा कुछ नहीं दिखता
किरण के परिवार वालों ने बताया कि किरण को इन बच्चों से इतना प्यार है कि वे इन बच्चों की पढ़ाई लिखाई में व्यवधान न पड़े उसके लिए न तो कहीं आना जाना पसन्द करती है और न ही अपने अन्य कामों में समय जाया करती है। किरण इन बच्चों के भविष्य को निखारने व उनको सहयोग देने में ही अपना सारा समय देती हैं। किरण सुबह व शाम को दोनों समय इन बच्चों को पढ़ाती है। बच्चों का भी किरण से लगाव ऐसा है कि वो भी मन लगाकर यहां पढ़ाई कर के उनकी बात मानते हैं।
पहले लोग बनाते थे मजाक
किरण ने बताया कि जब मैं नवीं कक्षा में पढ़ती थी तब से मैंने यह काम शुरू किया लेकिन पहले तो लोग बहुत मजाक उड़ाते थे कहते थे खुद का पता नहीं दुसरों को क्या शिक्षा देगी, लेकिन वहीं लोग अब मेरे साथ जुड़कर काम करना चाहते हैं।
जो लोगों से मिलता है उससे चलता है मेरा जीवन
किरण ने बताया कि जो बच्चों के लिए कपड़े इत्यादि लोगों से मिलता है, मैं भी उन्हीं कपड़ों को पहन कर अपना जीवन यापन कर रही हूं। इसके साथ ही अपने गुल्लक में जो थोड़ा पैसा इक_ा होता है उसको भी इन बच्चों पर ही खर्च करती हूं।





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