सीकर. शेखावाटी की राजनीति ने भले ही चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग को लगातार चार मंत्री दिए हों। लेकिन, स्वास्थ्य सुविधाएं इसके बाद भी नहीं सुधरी हैं। स्थिति यह मिली है कि मरीजों को फायदा पहुंचाने में सीकर, चूरू व झुंझुनूं तीनों ही जिले फिसड्डी साबित हुए हैं। बानगी यह है कि खुद स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी की गई ऑनलाइन टेलीमेडिसन सेवा की रिपोर्ट में तीनों को बेहद कमजोर दर्शाया गया है। जबकि प्रदेश के बाकी पिछडे़ व आदिवासी जिले मरीजों को दी जाने वाली बेहतर सेवा में इनसे बहुत आगे आ रहे हैं।
जानकारी के अनुसार विभाग द्वारा मई से जारी हुई टेलीमेडिसिन कंसल्ट रिपोर्ट में तीनों जिलों के प्रमुख अस्पतालों में मरीज को मिल रही इस ऑनलाइन चिकित्सा सेवा में सबसे नीचले पायदान पर बताया गया है। जबकि वर्तमान में सीकर जिले से कालीचरफ सर्राफ व बंशीधर बाजिया दोनों मंत्री विभाग के मंत्री बने हुए हैं। इससे पहले चूरू में राजेंद्र राठौड़ व झुंझुनूं के राजकुमार शर्मा चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री रह चुके हैं। लेकिन, मई की रिपोर्ट में सीकर का एसके अस्पताल, चूरू का डीबी राजकीय अस्पताल व झूंझुनूं का बीडीके अस्पताल अंकों में सबसे बेहद कमजोर श्रेणी में आए हैं। जबकि इनमें दो जिलों के सरकारी अस्पताल तो मेडिकल कॉलेज से भी जुड़े हुए हैं।
तीनों महिनों में बिगड़ी स्थिति
कंसल्टेंट रिपोर्ट में रिमार्क के नाम पर तीनों जिलों को वेरी पुअर बताया गया है। मई में इन्होंने केवल 70 मरीजों को टेलीमेडिसिन सेवा का लाभ दिया है। जबकि इनसे पहले 15 जिलों को इस सेवा के लिए पुअर, 12 को गुड, दो को वेरी गुड व पांच जिलों के संचालित हो रहे सरकारी अस्पतालों को एक्सीलेंट माना गया है। इधर, जून और जुलाई की रिपोर्ट में एसके अस्पताल में केवल 22, झूंझुनूं के 28 व चूरू के सरकारी अस्पताल में 46 के करीब इलाज का आंकड़ा पहुंचा है।
रोगी की कट रही जेब
हर जिले के अंदर टेलीमेडिसन सेंटर इसलिए स्थापित किए थे। ताकि सरकारी अस्पताल में बेहतर इलाज का सपना लेकर आने वाले मरीज को बिना उपचार के खाली हाथ वापस नहीं लौटना पडे़। क्योंकि आउटडोर के दौरान यहां यदि किसी मरीज की स्थिति चिकित्सक को समझ नहीं आए तो वे उ"ा स्तरीय परामर्श के लिए जयपुर बैठे विशेषज्ञों से उपचार के लिए परामर्श हासिल कर सकें। ऑनलाइन रिपोर्ट भेजकर चेकअप व दवा में तब्दिली की जा सके। लेकिन, मरीजों की अनदेखी करते हुए कई चिकित्सकों ने इस सुविधा की जरूरत ही नहीं समझ़ी। बाद में रोगी की सेहत में सुधार नहीं होने पर उसने भी बाहर निजी अस्पतालों में जांच व परामर्श के नाम पर लाखों फूंकने पड़ गए।
सहयोग की कमी
एसके अस्पताल के टेलीमेडिसिन सेंटर के प्रभारी मामराज ढ़ाका के अनुसार सुपर स्पेशलिटी सेवा के लिए प्रशासन व चिकित्सक रूचि नहीं ले रहे हैं। इसलिए अस्पताल आखरी पायदान पर आ रहा है। जबकि मरीज का सहयोग करने पर उसे 15 मेडिकल विभागों से जुडे़ विशेषज्ञों का तत्पर फायदा मिल सकता है। गौर तलब है कि हर जिले में सेंटर पर दो का नर्सिंग स्टाफ लगा रखा है। दोनों की सवा लाख रुपए तनख्वाह के अलावा प्रतिमाह 25 हजार रुपए सेंटर की देखरेख में विभाग को खर्च करने पड़ रहे हैं।
इनका कहना
मेडिकल कॉलेज के शुरू होने के बाद इस तरह की समस्याएं एसके अस्पताल में नहीं रहेंगी। नई फैकल्टी आएगी तो मरीजों को और भी बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। हालांकि टेलीमेडिसिन की सेवा में सुधार करने के प्रयास किए जाएंगे।
डा. गोवर्धन मीणा, प्रिंसीपल एंड कंट्रोलर, श्रीकल्याण मेडिकल कॉलेज सीकर





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