बीकानेर. बारिश में चारों ओर छाई हरियाली से खुशनुमा हुए मौसम में भाद्रपद मास की तृतीया को बड़ी तीज (कजली तीज) पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं दिनभर व्रत-उपासना के बाद चन्द्रोदय के समय मां कजली का पूजन करती हैं और चन्द्रमा को अघ्र्य देकर अखण्ड सुहाग की कामना करती हैं। दशकों से इस पर्व का शहर में होली के अवसर पर मंचित होने वाली स्वांग मेहरी रम्मत के चौमासा गीत में विशेष उल्लेख होता है। रम्मत उस्ताद के नेतृत्व में कलाकार मां कजली के इस पूजन पर्व का तल्लीनता से नाच-गान कर वर्णन करते है।
आषाढ़ और सावन में जब काली घटाएं छा जाती है और मेघ बरसते हैं तो ताल-तलैया भर जाते हैं। मोर-पपीहे की आवाज गूंजने लगती हैं। एेसे में प्रकृति की सुंदरता में चार चांद लग जाते हैं। एेसे ही मौसम में बालिकाएं और महिलाएं बड़ी तीज का पर्व मनाती हैं। महिला व युवतियां इस दिन सज-धज कर झूला झूलने जाती हैं। रात को पूजा-अर्जना करती हैं और व्रत का पारणा करती हैं।
हर साल लिखा जाता है गीत
रम्मत कलाकार मुन्ना महाराज ओझा बताते है कि स्वांग मेहरी रम्मत में हर वर्ष चौमासा गीत लिखा जाता है। इसमें चौमासा ऋतु के चार महीनों आषाढ़, सावन, भाद्रपद और आश्विन मास में प्रकृति की सुन्दरता और नारी हृदय में उमडऩे वाली भावनाओं, मेलो-मगरियों व पर्व-त्योहारों का वर्णन और एक पत्नी की मनुहार को गीत के माध्यम से रखा जाता है।
झूला झूले बागन में...
बड़ी तीज पर्व का चौमासा गीत में पूजन और इससे जुड़ी परम्परा का भी वर्णन किया जाता है। महिलाओं के सोलह शृंगार पर 'सज धज सोलह शृंगार तिजणिया, बन ठन नितरी हरखासीÓ, वहीं झूला झूलने को लेकर 'झूला झूले बागन में सखियां चम्पे की डालीÓ, बड़ी तीज पर 'आछरीÓ और बहन बेटियों को फल,
मिठाइयां देने की परम्परा पर 'सातु साड़ी फल मीठो पीहर सूं थाली भर लासीÓ तथा अपनी सास के संग कजली तीज के पूजन को 'भादूडे़ री तीज कजली सासू संग पूजण जावै, मां कजली पूजूं, सासूजी कथा सुणावेÓ के माध्यम से वर्णन मिलता है। बड़ी तीज के व्रत का पारणा सातु को ग्रहण करने, तीज का ऊजाणा, कथा सुनने आदि का उल्लेख भी चौमासा गीत में मिलता है।





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