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घर जैसा ही तो है वृद्धाश्रम, यहां हमउम्र दोस्त हैं, पंजा भी लड़ाते हैं

जयपुर. व्यक्ति के लिए घर-परिवार से बड़ा कुछ नहीं लेकिन कई वृद्धजन ऐसे हैं, जिनके लिए अब वृद्धाश्रम ही घर और वहां रह रहे लोग ही उनका परिवार हैं। राजस्थान पत्रिका ने घाटगेट स्थित अपना घर वृद्धाश्रम का जायजा लिया और बुजुर्गों से बातचीत की तो यही स्थिति सामने आई।

बुजुर्गों ने बताया कि उनमें से किसी को बच्चे छोड़ गए, किसी को अकेलापन महसूस हुआ तो खुद ही वृद्धाश्रम में आ गए। लेकिन घर छोड़कर आश्रम में रहने का अब कोई दु:ख नहीं है। आश्रम को ही घर बना लिया है और वहां रहने वालों को अपना परिवार। दोमंजिला इमारत के ४ कमरों में संचालित उक्त वृद्धाश्रम में 23 बुजुर्ग महिला-पुरुष रह रहे हैं। सेवा के लिए नौकर नहीं है बल्कि खाना बनाने से लेकर साफ-सफाई तक हर काम मिलजुलकर खुद करते हैं। जिसे मदद की जरूरत होती है, आपस में मिलकर सुख-दुख बांटते हैं। हालांकि दोमंजिला इमारत में बुजुर्गों के टहलने के लिए स्थान नहीं है, कोई काम पड़े तो एक मंजिल सीढिय़ां उतरनी पड़ती हैं।

 


दांत में दर्द था, जांच कराने साथ गए लोग
कल दांत में बहुत दर्द था। सहन नहीं हुआ तो डॉक्टर के यहां गए। शास्त्रीनगर स्थित अस्पताल तक अकेले नहीं जा सकती थी इसीलिए आश्रम से एक सज्जन साथ गए। डॉक्टर ने दांत निकालने को कहा है, कल फिर साथ में जाएंगे। आश्रम में कुछ समय पहले ही आई हूं, यहां माहौल बहुत अच्छा है। सभी लोग एक-दूसरे की मदद करते हैं। इतनी देखरेख तो परिवार में भी नहीं होती।

- नर्मदा बाई (90 वर्ष)

 


पुलिस १२ साल पहले आश्रम में छोड़ गई थी। बोल नहीं सकती, इसलिए अपना नाम-पता नहीं बता पाई। शक्ल-सूरत से पहाड़ी और दूसरों की सेवा में आगे थी इसीलिए सबने मिलकर शमा नाम रख दिया। शमा ने इशारों में बताया, अब तो यह आश्रम ही मेरा घर-परिवार है।
- शमा (65 वर्ष)

 

मैं तब से हूं, जब आश्रम शुरू ही हुआ था। मेरे सामने सैकड़ों लोग आए-गए। कई तो दुनिया से चले गए। वृद्धजन के लिए यह आश्रम बड़ा सहारा है। यहां कब सुबह होती है और कब शाम, पता ही नहीं चलता। सब मिलजुलकर काम करते हैं। शाम को सब एकसाथ टीवी देखते हैं।

- मंजू देवी (77 वर्ष)

 


परिवारों में सब व्यस्त होते हैं। यहां हम सबके पास एक-दूसरे के लिए खूब समय है। आश्रम में सहेलियां भी बन गई हैं। खूब बातें करते हैं। हर मंगलवार-शनिवार को दोपहर 2 बजे सुंदरकाण्ड पाठ करती हूं। सभी सहेलियां सुदंरकाण्ड सुनती हैं। जीवन खुशी से बीत रहा है।
- विमला देवी (65 वर्ष)

 

तेरह साल बीएसएफ में नौकरी के बाद लम्बे समय तक खेती की। खेती नहीं बची तो जयपुर आकर सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी की। एक पैर खराब होने के बाद आश्रम आ गया। जीवन के बाद यह शरीर और आंखे दूसरों के काम आ सकें, इसीलिए देह और आंखें दान कर रखी हैं। यहां हमउम्र लोगों के साथ दिन लम्बा नहीं लगता बल्कि आराम से कटता है।

- जगदीश मिश्रा (82 वर्ष)

 


यूपी पुलिस में 12 साल तक हैड कांस्टेबल रहा। फिर पुलिस की यूनियन बनी और लीडर बनने के कारण नौकरी से इस्तीफा दे दिया। बाद में जयपुर आकर अगरबत्ती का काम किया। अब आश्रम में दोस्तों के साथ जीवन अच्छा बीत रहा है। सभी साथ में टीवी देखते हैं, पंजा भी लड़ाते हैं।
- सुरेशचंद पालीवाल (92 वर्ष)

 

बीए तक पढ़ाई के बाद मुरादाबाद में काम पर लगा लेकिन तेल मिल बंद हुई तो दुकान भी बंद हो गई। फिर परिवार के साथ जयपुर आ गया। बेटी की शादी के बाद से आश्रम में रह रहा हूं। अंग्रेजी पढऩे का शौक है इसलिए पत्रिका का अंग्रेजी वाला पन्ना खासतौर पर पढ़ता हूं।

- कमल अग्रवाल (65 वर्ष)



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