राणावास । क्षेत्र की अरावली वनसम्पदा को यहां के बबूल लील रहे हैं। तलहटी क्षेत्र में उगे बबूल अब पहाडिय़ों की ऊंचाई भी फैल चुके हैं। धीरे-धीरे यहां पाई जाने वाली अमूल्य वन व वानस्पतिक सम्पदा को बबूल निगलता जा रहा है। यहां चारों ओर नजर दौड़ाने पर बबूल ही बबूल नजर आने लगे हैं।
अंग्रेजी राज में यहां विलायती बबूल हरियाली बढ़ाने के लिए लगाया गया था, लेकिन आज वह नासूर बन गया है। यह जैव विविधता के लिए बड़ा खतरा है। अरावली की पहाडिय़ों सहित पूरे क्षेत्र में फैला विलायती बबूल देशी पेड़-पौधों की लगभग 500 प्रजातियों को खत्म कर चुका है। समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो पेड़-पौधों की रही-सही प्रजातियां भी खत्म हो जाएंगी। शुष्क क्षेत्रों में जल संकट भी गहरा सकता है। यहां अरावली की पहाडिय़ों में एक किलोमीटर तक ऊपर की ओर जा चुका बबूल धीरे-धीरे वनस्पति को खत्म करता जा रहा है। अरावली की पहाडिय़ों में अब धावड़ा, जंगली कदम, आंवला, जामुन, नीम, लोबोन, सीताफल, आम, खाखरा, गागन, बास, बडक़ा पेड़, बरगद, नीम, खेर सहित सैकड़ों देशी पौधे अब कम दिखाई देने लगे हैं।
यह होता है नुकसान
अंगे्रजी बबूल की हरियाली के फायदे कम, नुकसान ज्यादा हैं। जिस जमीन पर यह पैदा होता है। वहां कुछ और नहीं पनपते देता। इसकी पत्तियां छोटी होती हैं। पर्यावरण की दृष्टि से भी इसका कोई उपयोग नहीं है। यह पेड़ बहुत कम कार्बन सोखता है। विलायती बबूल से पक्षियों की प्रजातियां भी काफी कम हो गई हैं।
यह है जूलीफ्लोरा
विलायती बबूल का वैज्ञानिक नाम जूलीफ्लोरा है। यह मूलरूप से दक्षिण और मध्य अमेरिका तथा कैरीबियाई देशों में पाया जाता है। यह दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिम उत्तर प्रदेश में पाया जाता है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, उडीसा, और आंध्र प्रदेश में भी इसके पेड़ मिलते हैं। बताया जाता है कि जोधपुर रियासत ने 1940 में इसे
शाही वृक्ष का दर्जा दिया और राज्य के बड़े भूभाग में लगाया गया था।
अरावली के पहाडों में विलायती बबूल तेजी से नीचे से ऊपर की ओर बढ़ रहा है। इससे आने वाले समय में अरावली पर्वतमाला में मौजूदा वनस्पति पूरी तरह से नष्ट हो जाएगी। समय रहते प्रशासन और वन-विभाग को विलायती बबूल को जड़ मूल से मिटाने का प्रयास करना चाहिए। आवागमन के मार्गों पर भी विलायती बबूल ने अपनी जड़े गहरी कर रखी हैं। कई बार हादसे भी होते हैं।
पूनाराम सीरवी, भाजपा किसान मोर्चा प्रदेश मंत्री, गुड़ासूरसिंह





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