इतना भी न गिरो
पूरे देश में इस समय केरल की बाढ़ की चिंता छाई है। हर खास और आम इसमें अपना योगदान देने में लगा है। जो नहीं दे पा रहा है वह दुआएं भी दे रहा है। जबकि कुछ लोगों को इसमें भी वोटों की सुगंध आ रही है। विरोध की चिंता में घुले जा रहे एक नेताजी ने एक कार्यक्रम में निजी मंडली में कह दिया कि यह सब तक ऊपर वाले का दंड है। इसमें भी उन्होंने गोमाता का नाम लेकर माहौल बनाने का प्रयास किया। सयानों ने तत्काल सलाह दी कि भाईसाहब सार्वजनिक रूप से ऐसा न कहें। इधर, मातृ संगठन सेवा में लगा पड़ा है और ये जनाब राजनीति में। दान के नाम पर दमड़ी भी नहीं देने वाले नेताजी की निजी मंडली के लोग अभी उनसे किनारा करने में लगे हैं। एक भाई ने बताया कि पूरी मंडली पीछे से कह रही है कि इतना नीचे न गिरो।
श्रेय लेने वाले
शहर की हालत किसी से छुपी नहीं है। कॉलोनियों की गलियों से लेकर अधिकांश मुख्य सडक़ों से निकलना परीक्षा से कम नहीं है। अब लगातार समस्या सामने आने के बाद एक सडक़ की सुध लेना शुरू किया गया। इसके शगुन में पहले एक वीआईपी सडक़ बनवाकर पूरी की गई। अब स्टेशन के सामने की सडक़ कछुआ चाल से बनना शुरू हुआ। इधर, काम शुरू हुआ और उधर श्रेय लेने वाले दुकान चलाने लगे। सडक़ से पीडि़त ने कहा कि पक्ष और विपक्ष दोनों ही आकर कह रहे हैं हमने सडक़ बनवाई है। भाई ने कहा कि, का बरसा जब कृषि सुखाने?
नहीं लगता शहर में मन
अलवर के एक भाई साहब का शहर में मन नहीं लगता और जब देखो तब किशनगढ़बास में दिखते हैं। चुनाव नजदीक आए तो सब अपना-अपना घर संभालने लगे, लेकिन भाई है कि घर पर टिकते ही नहीं। ऐसा भी नहीं कि भाई साहब राजनीति में कोई संत बनने आए हो, लेकिन शहर से दूरी लोगों की समझ नहीं आ रही। दिल्ली पहुंचने की बात आती है तो भाई साहब सबसे आगे की कतार में दिखते हैं, लेकिन शहर से जयपुर की दूरी नापने की बात आती है तो भाई साहब किशनगढ़बास के क्षेत्र में मिलते हैं। अब तो अपने ही भाई लोग भी कहने लगे कि भाई साहब दिल्ली का रास्ता भी अलवर से ही जाता है, पहले अलवर में पैर जमाओगे, तभी तो दिल्ली नजदीक आएगी।
चुनावी साल में बजट खपाओ
चुनावी साल में हर किसी को बजट खपाने की चिंता लगी है। पढ़ाने वाले महकमें में छात्रवृत्ति समय पर बांटने और बकाया कामों के आए बजट को जल्दी खपाने के आए दिन आदेश आ रहे हैं। इसके अतिरिक्त बहुत से दूसरे विभागों में भी बजट को खपाने को लेकर कसरत चल रही है। बजट खपाने में हो रहे काम की गुणवत्ता को लेकर किसी को चिंता नहीं है। सरकारी विभाग के बहुत से अधिकारी इसे गोल्डन चांस मानकर काम कर रहे हैं।





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