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रक्षाबंधन विशेष- राजस्थान करे गर्व, बदली सोच बनी बहनों का कवच

रतन दवे/बाड़मेर। रेगिस्तानी बाड़मेर जिला जहां बेटियों को जन्म लेते ही मारने और उनकी परवरिश में भेदभाव करने की तोहमत लगती थी, इस रक्षा बंधन को पूरे राज्य को बाड़मेर पर गर्व करना चाहिए। इस जिले में अब बेटियों और बेटों के लिंगानुपात का फर्क आने वाले पांच साल में खत्म होने की स्थिति में आ गया है। राज्य में लिंगानुपात एक हजार लडक़ों पर 948 का है और बाड़मेर 954 पहुंच गया है। जिले का लिंगानुपात 2010-11 में एक हजार लडक़ों पर 871 ही था, जो अब 954 आ गया है। आठ साल में 83 लड़कियां प्रति एक हजार पर बढ़ी है। इस साल 33399 लडक़ों का जन्म हुआ है तो लड़कियां भी 31838 जन्मी है, जो जिंदा है। वर्ष 2011-12 में 21 हजार 871 बेटियां ही जिंदा रही थी।

 

कमांडो फोर्स में बाड़मेर की बेटियों ने दिखाया दम

पश्चिीमी सीमा पर बीएसएफ की पांच बटालियन है। पिछले छह साल से यहां हर बटालियन में पांच-छह युवतियां तैनात की गई हैं, जो देश की सुरक्षा का जिम्मा संभाल रही है।
थार के दुरूह गांव सुथारों का तला में सौ से ज्यादा बेटियां एेसी है जो पिछले पन्द्रह साल से अपने दम-खम पर जूडो में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण व रजत पदक विजेता रही है। पुलिस की विशेष कमांडो फोर्स में बाड़मेर की बेटियों ने दम दिखाया है।


सोच बदली है
लोगों की सोच बदली है। मीडिया बड़ा माध्यम है, प्रचार-प्रसार,टीवी, रेडियो, समाचार, टीवी कार्यक्रम सब यही सीख दे रहे है कि बेटियां बेटों से कम नहीं। इसी वजह से यह स्थिति आई है। यह संख्या और आगे बढ़ेगी। ये निश्चित ही एक आशाजनक संकेत हैं।

महेश पनपालिया, सामाजिक कार्यकर्ता

 

काफी फर्क पड़ा है
लोगों में शिक्षा का स्तर सुधरा है। चिकित्सा सुविधाएं व जागरूकता बढ़ी है। पीसीपीएनडीटी एक्ट और संस्थागत प्रसव का भी असर पड़ा है। इन सभी के कारण लिंगानुपात में सुधार आया है।
डॉ.कमलेश चौधरी, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी


लिंगानुपात
राजस्थान बाड़मेर
2010-11 887 871
2011-12 900 873
2012-13 905 885
2013-14 924 934
2014-15 929 944
2015-16 929 956
2016-17 938 958
2017-18 948 954



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