कोलकाता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विश्व मानवता दिवस पर ट्वीट के माध्यम से कहा कि राष्ट्रीय नागरिक पंजीयन (एनआरसी) के मसौदे से वंचित रखे गए असम के 40 लाख लोगों के लिए उनके हृदय में सहानुभूति है। उल्लेखनीय है कि इससे पहले भी एनआरसी को लेकर ममता बनर्जी ने केंद्र की मोदी सरकार का जमकर विरोध किया है।
'मानवाधिकार का सम्मान संविधान का मूल सिद्धांत'
ममता ने ट्विटर के माध्यम से कहा, 'आज विश्व मानवता दिवस है। मानवाधिकार का सम्मान हमारे संविधान का मूल सिद्धांत है। इस अवसर पर मेरे दिल में उन 40 लाख लोगों के लिए सहानुभूति है जिन्हें असम के एनआरसी में शामिल नहीं कर अपने ही देश में शरणार्थी बना दिया गया है।'
खारिज हो चुके हैं 37 लाख दावे
पूर्ण एनआरसी मसौदे को 30 जुलाई को प्रकाशित किया गया जिसमें 2,89,677 लोगों के नाम हैं और 40,70,707 लोगों को मसौदे में शामिल होने के लिए अयोग्य ठहराते हुए इससे वंचित कर दिया गया है। 40,70,707 नामों में से 37,59,630 के दावों को अस्वीकार कर दिया गया है, जबकि 2,48,077 दावे लंबित हैं।
एनआरसी में कब-क्या हुआ?
1. 1971 में पाकिस्तान से आजाद होकर बांग्लादेश अलग देश बना था। तभी से कई लोग अवैध तरीकों से भारत में आकर बसने लगे।
2. 80 के दशक में अखिल असम छात्र संघ और असम गण परिषद के आंदोलन ने जोर पकड़ लिया।
3. 1985 तत्कालीन राजीव गांधी सरकार और आंदोलनकारियों के बीच एक समझौता हुआ था। इसके तहत केंद्र ने आश्वासन दिया था कि अवैध बांग्लादेशियों को बाहर किया जाएगा।
4. 15 अगस्त 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने असम अकॉर्ड की घोषणा की थी।
5. 1985 से लागू असम समझौते के अनुसार 24 मार्च 1971 की मध्य रात्रि तक असम में प्रवेश करने वाले लोगों और उनकी पीढ़ियों को भारतीय नागरिक माना जाएगा। लेकिन यह समझौता लागू नहीं हो पाया था।
6. 2013 में असम के कई संगठनों ने इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी।
7. 2018 में जुलाई महीने में एनआरसी पर फाइनल ड्राफ्ट पेश किया गया।





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