सवाईमाधोपुर. रणथम्भौर त्रिनेत्र गणेश जागरण मंडल एवं गणेश मंदिर ट्रस्ट के तत्वावधान में सोमवार रात आलनपुर सर्किल स्थित एक मैरिज गार्डन में भजन संध्या एवं रात्रि जागरण का आयोजन किया गया। भजन संध्या में गायकों ने एक से बढ़कर एक भजनों की प्रस्तुतियां दी। देर रात तक श्रोता भजनों में झूमते रहे। आयोजन से जुड़े अशोक खूंटेटा ने बताया कि गायक कमलेश जायसवाल ने 'क्यूं घबराऊ मैं, मेरा गणेश से नाता है' सुनाकर भजन संध्या का आगाज किया।
इसके बाद भजन संध्या में सावन कुमार ने मोरे अंगना पधारो गणपतजी.., राजेन्द्र जैन ने देव गजानंद मुझे देना सहारा, गायिका रानू सैन ने बांह पकड़ लो गणपति, कही छूट ना जाए, अनन्या वर्मा ने कब आआगे मेरे गोरी गणेश, प्रदीप ने गणपति मेरी बिगड़ी बना दो, अंतिमा शर्मा ने गजानंद घर कब आवोगे..सुनाकर श्रोताओं को गणेश भक्ति के रंग में रंग दिया। तड़के चार बजे तक श्रोता झूमते हुए भजनों का आंनद लेते रहे।
लोककथा : तीन काम
ए क बार दो गरीब दोस्त किसी नगरसेठ के पास काम मांगने गये। सेठ ने उन्हें काम पर रख लिया और पूरे साल काम करने पर साल के अंत में दोनों को 12-12 स्वर्ण मुद्राएं देने का वचन दिया। सेठ ने यह शर्त भी रखी कि काम ठीक से नहीं किया या किसी आदेश का उल्लंघन किया तो उस एक गलती के बदले चार स्वर्ण मुद्राएं तनख्वाह से काट ली जायेगी। सालभर काम करने के बाद दोनों दोस्त सेठ के पास 12-12 स्वर्ण मुद्राएं मांगने पहुंचे। मुद्राएं मांगने पर सेठ बोला- 'अभी साल का आखिरी दिन पूरा नहीं हुआ है। मुझे तुम दोनों से आज ही तीन और काम करवाने हैं।
पहला काम, छोटी सुराही में बड़ी सुराही डाल कर दिखाओ। दूसरा काम, दुकान में पड़े गीले अनाज को बिना बाहर निकाले सुखाओ। तीसरा काम, मेरे सिर का सही-सही वजन बताओ।Ó 'यह तो असंभव है,Ó दोनों दोस्त एक साथ बोले। 'ठीक है तो फिर यहां से चले जाओ। मैं हर एक काम के लिए चार स्वर्ण मुद्राएं काट रहा हूं।Ó मामला फंसते देख दोस्त एक विद्वान पंडित के पास पहुंचे। पंडित पूरी बात समझने के बाद उन्हें वापस सेठ के पास भेजता है। सेठ के पास पहुंच दोनों मित्र बोलते हैं, 'सेठ जी अभी आधा दिन बाकी है, हम आपके तीनों काम किये देते हैं।Ó दोनों दोस्त दुकान के अन्दर घुस बड़ी सुराही को तोड़-तोड़कर छोटी के अन्दर डाल देते हैं। सेठ मन मसोस कर रह जाता है।
इसके बाद गीले अनाज को दुकान के अन्दर फैला देते हैं। फिर दोनों मिलकर दुकान की दीवार और छत तोड़ डालते हैं, जिससे वहां हवा और धूप आने लगती है। मित्रों को क्रोधित सेठ और उसके आदमी देखते रह जाते हैं, किसी की भी उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती। अब आखिरी काम बचा होता है। दोनों मित्र तलवार लेकर सेठ के सामने खड़े हो जाते हैं और कहते हैं, 'मालिक, आप के सिर का सही-सही वजन तौलने के लिए इसे धड़ से अलग करना होगा। कृपया बिना हिले स्थिर खड़े रहें।Ó सेठ को सारा माजरा समझ आ जाता है। वह तुरंत दोनों के हाथ में 12-12 स्वर्ण मुद्राएं रख देता है।





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