भीलवाड़ा।
विश्व में वस्त्रनगरी के रूप में विख्यात भीलवाड़ा जिला प्राकृतिक सौंदर्य, पुरासम्पदा एवं एेतिहासिक धरोहर का भी धनी है, लेकिन पर्यटन विकास की विपुल संभावनाओं के बावजूद जिले की अधिकांश धरोहर संरक्षण एवं संवर्धन को तरस रही। विदेश एवं देश के विभिन्न हिस्सों से यहां कपड़ा खरीदने एवं नए उद्योग की स्थापना के साथ ही विभिन्न अवसर पर आने वाले लोगों को उस वक्त बड़ी निराशा हाथ लगती है, जब जिले में एक भी पर्यटन स्थल उन्हें विश्व के पर्यटन मानचित्र पर उभरा नजर नहीं आता है। चुनावी मौसम में जनप्रतिनिधि व प्रत्याशी क्षेत्र के धार्मिक, रमणीय, दर्शनीय, वन क्षेत्र एवं पहाड़ी पर स्थित मनभावन स्थलों के विकास का वायदा करते है, लेकिन हालात बाद में जस के तस ही रहते है।
जिले के पर्यटन स्थलों की स्थिति एेसी नहीं है कि विदेशी सैलानी आकर्षित हो। जिला प्रशासन ने गत वर्ष से भीलवाड़ा महोत्सव शुरू कर देश के पर्यटकों को खींचने की पहल की लेकिन अभी इसमें कामयाब नहीं हो पाया। जिले में एेतिहासिक स्मारक खूब हैं। प्रकृति ने मुक्त हाथ से सौन्दर्य लुटाया है। सरकार व जनप्रतिनिधियों की अनदेखी से पर्यटन को बढ़ावा नहींं मिल सका है।
फाइलों में बंद सुविधा
मांडलगढ़, बनेड़ा व जहाजपुर के दुर्ग तथा बदनोर व शाहपुरा के महल सालों से सरकारी फाइलों में जनता को समर्पित होने को तरस रहे हैं। देश का प्रसिद्ध जलप्रपात मेनाल को पर्यटन के रूप में विकसित करने के लिए वन विभाग ने पहल की और यहां टूरिस्ट भवन बनाया, लेकिन जलप्रपात के साथ ही ये भी सुविधा को तरस रहा है। बिजौलियां के तीन प्रमुख मंदिर 'महाकालेश्वर मंदिरÓ, 'हजारेश्वर महादेव तथा 'उण्डेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाने जाते हैं इसी परिसर में मंदाकिनी जलकुण्ड है, लेकिन क्षेत्र का समूचित विकास नहीं हो सका। सिंगोली श्याम व जोगणिया माता की भी महिमा है।
मेले से फड़ तक लुभाती
आसीन्द के विश्व प्रसिद्ध सवाईभोज देवनारायण मंदिर, शाहपुरा का प्रसिद्ध रामद्वारा, बारहठ स्मारक तथा बीगोद का त्रिवेणी संगम व यहां का 'सौरत का मेलाÓ भी जिले की शान है। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते है, लेकिन यहां के लिए सरकार ने विकास की बड़ी घोषणा नहीं की है। तिलस्वां महादेव में प्रसिद्ध जलकुण्ड भी धार्मिक आस्था का केन्द्र है, यहां का भी सुनियोजित विकास नहीं हो सका है। शाहपुरा व भीलवाड़ा की चित्ताकर्षक फ ड़ चित्रकला और भवाई, बहरूपिया एंव मांडल का गैर नृत्य जैसी गौरवशाली सांस्कृतिक परम्पराएं भी भीलवाड़ा की पहचान हैं। लेकिन पर्यटकों से दूर है
विकास की सीढ़ी नहीं चढ़ पाई आस्था
शहर में हरणी महादेव मंदिर व चामुंडा माता मंदिर आस्था का केन्द्र होने के बावजूद विकास की सीढ़ी नहीं चढ़ सका। स्मृति वन, नेहरू उद्यान, राजीव गांधी पार्क, देवरिया बालाजी मंदिर, मानसरोवर झील, शिवाजी उद्यान गार्डन को भी सरकार की सौगात नहीं मिल सकी। पुर में देवडूंगरी, पातोला महादेव, अधरशिला, क्यारा का हनुमानजी, नीलकंठ महादेव , घाटाराणी, नृसिंहद्वारा, लाडूडय़ा डूंगर तथा राज सरोवर की पहचान जिले के नक्शे से बाहर नहीं निकल सकी। सांगानेर में प्राचीनगढ, कबीर द्वारा व सिंदरी के बालाजी सुरम्य स्थल हैं जहां हनुमान मंदिर व बगीचा हैं। यहां श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। जिले में शाहपुरा का धनोप माता व कोटड़ी चारभुजा आस्था का केन्द्र है। मांडल मे मेजा बांध तथा मांडल में बिखरी पुरा सम्पदा, तालाब की पाल, बत्तीस खंबो वाली जगन्नाथ कछवाहा की छतरी का स्थापत्य सौन्दर्य की अलग पहचान हैं। गंगापुर में गंगा बाइसा महारानी की छतरी दर्शनीय हैं। सिंघवीजी की हवेली तथा कुछ प्राचीन भवनों पर भित्ति चित्र देखने को मिलते हैं। हमीरगढ़ का इको पार्क व पुराना दुर्ग तथा चामुंडा माता का मंदिर, काछोला में प्राचीन भिाणाय की बावड़ी दर्शनीय है। रखरखाव के अभाव में बावड़ी जीर्ण शीर्ण हो रही है। पांच मंजिला बावड़ी का शिल्प स्थापत्य अनूठा है। जरुरत है इसके विकास की और इसे पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की। जिले में मेजा बांध, जैन तीर्थ चंवलेश्वर, गुप्तेश्वर महादेव मंदिर, धोड़ का प्राचीन मंदिर, धानेश्वरम तीर्थ, गुलाबपुरा, लादूवास, बागोर, जगदीश उमरी एवं रायपुर आदि भी दर्शनीय हैं। लेकिन इन धराहरों की संरक्षण की जरूरत है। जीर्ण शीर्ण होने से बचाने के लिए सरकारी प्रयासों की आवश्यकता है।
जिला प्रकृति, इतिहास,धर्म स्थल व एतिहासिक धरोहर के नजरिए से बेहद खूबसूरत है, जिले ने वस्त्र उत्पादक के रूप में जो जगह देश एवं विदेश में बनाई है, उसी तरह की संभावना यहां बिखरी पुरा सम्पदा, प्रकृति की बिखरीप्राचीन धरोहरों से नजर आती है, इसके लिए जरूरी है कि क्षेत्रों का विकास हो और सरकार इनके संरक्षण एवं सर्वधण के लिए कुछे करें।
श्याम सुन्दर जोशी, रिटायर्ड, संयुक्त निदेशक, (जनसम्पर्क) भीलवाड़ा





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