अश्वनी प्रतापसिंह @ राजसमंद. शरीर से दुबली-पतली रजनी (बदला हुुआ नाम) के छह बच्चे हैं, सातवीं बार वह तीन माह की गर्भवती है। घर खर्च के लिए पति राजेश (बदला हुआ नाम) के साथ वह भी नरेगा में मजदूरी करती है। सुबह पांच बजे उठकर पशुओं के चारे-पानी की व्यवस्था करती है, परिवार के लिए खाना पकाती है, चार बच्चे पढऩे जाते हैं, उन्हें तैयार कर स्कूल भेजती है और फिर निकल पड़ती है पति के साथ नरेगा में मजदूरी के लिए। यहां भी उसे सिर्फ मजदूरी नहीं करनी है, दो मासूम उसके साथ हैं, उनको दूध पिलाना, खाना खिलाना। शाम को फिर घर पहुंचकर सबके लिए खाना बनाना, और बाद में जो बचे उसे खाकर चुपचाप सो जाना। गतशाम भी यही हुआ। उसने सबका पेट भर दिया, और सिर्फ दो रोटियां बची वही खाकर चुपचाप सो गई। मशीन की तरह चलने वाली दिन चर्चा केवल रजनी की नहीं है, बल्कि कमोवेश यह स्थिति हर घर में हर महिला की है। परिवार की परवरिश में वह स्वयं का ख्याल नहीं रखती। सबको खिलाने के बाद जो कुछ बचा उसे खाकर सो जाना उसकी आदत में शामिल हो गया है। दिनभर कमरतोड़ मेहनत और रात को आधा पेट खाना खाने से लगातार महिलाओं में खून की कमी, प्रोटीन की कमी हो रही है, जिससे वह न केवल कमजोर हो रही हैं बल्कि प्रसव के दौरान मौत के मुंह तक भी पहुंच रही हैं।
नहीं मिलता पर्याप्त भोजन...
गांव-ढाणियों में निशुल्क चिकित्सा शिविर लगाने वाले डॉ. विजय कुमार खिलनानी बताते हैं कि गांव-ढाणियों में महिलाओं की स्थिति काफी बदतर है। शिविर में ऐसी बहुत महिलाएं आती है जिनके घर में खाने को नहीं होता है, बच्चों से लेकर महिलाएं तक कुपोषित है, बच्चों का पेट पालने के लिए कई बार वह भूखी सो जाती है। गर्भ के दौरान प्रोटीन तो दूर उन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता।
10 से 15 फीसदी महिलाओं में ही मिलता है पर्याप्त रक्त
स्वस्थ्य महिला के शरीर में १२ से १५ ग्राम हिमोग्लोबिन (प्रति एक सौ ग्राम मिलीलीटर रक्त) होना चाहिए। उपचार के दौरान जो महिलाएं आती हैं, उनमें 80 से 85 फीसदी महिलाओं में 11.5 ग्राम से कम हिमोग्लोबिन मिलता है। साथ ही प्रोटीन की मात्रा बहुत कम रहती है। गर्भावस्था में महिलाओं को पर्याप्त पोषकतत्व नहीं मिलते, बच्चों के जन्म में पर्याप्त अंतराल नहीं होने से शरीर में रक्त की कमी लगातार बढ़ती जाती है, जिससे महिलाओं का स्वास्थ्य लगातार गिर रहा है।
डॉ. प्रदीप सोनी, महिला रोग विशेषज्ञ, राजकीय आरके चिकित्सालय





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