बागोड़ा. प्रदेश के विकास को लेकर राज्य सरकार कई कल्याणकारी योजनाएं चलाकर रही है, लेकिन आज भी बागोड़ा उपखंड क्षेत्र में कई ऐसे वर्ग विशेष के लोग हैं जो अपना पेट भरने के लिए दिन भर कड़ी मेहनत कर पसीना बहाने के बावजूद भर पेट भोजन तक नहीं जुटा पाते हैं। हम बात कर रहे हैं जोगी बांसफोड़ जाति के लोगों की जो आधुनिकता की दौड़ में काफी पीछे छूट गए हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी छबड़ी बनाने का कार्य करने वाले इस जाति के लोगों को इससे ही थोड़ी बहुत मजदूरी भी मिल जाती है और जहां जगह मिले वहीं ये अस्थाई आवास बनाकर छबड़ी बनाने का काम शुरू कर देते हैं। शिक्षा से दूर यह लोग जैसे-तैसे परिवार का पेट पाल रहे हैं। महंगाई के दौर में पूरे दिन में मुश्किल से दाल-रोटी का ही जुगाड़ कर पाते हैं। शिक्षा की कमी के चलते इन्हें सरकारी योजनाओं का भी पूरा फायदा नहीं मिल रहा है।
पीढिय़ों से है परम्परा
बागोड़ा उपखंड मुख्यालय पर इस जाति के दर्जनों परिवार निवास करते हैं। बढ़ती महंगाई के चलते पैतृक धंधे के प्रति इन लोगों का रुझान कम हो रहा है। कुछ लोग तो पंजाब व अन्य शहरों की ओर पलायन कर गए और कुछ ने कृषि कुओं पर जमींदारों के यहां खेतीबाड़ी का काम शुरू कर दिया। वहीं कुछ परिवार पत्थर की कारीगरी व होटलों की चकाचौंध में नए लुक ढालने के लिए बांस के आलीशान झोपड़े बनाकर पेट पालने का जतन कर रहे हैं, लेकिन इस जाति के वृद्ध लोग आज भी इस परम्परागत धंधे से जुड़कर जीवन यापन कर रहे हैं।
लुप्त हो रही कला
बांस की लकड़ी को चीर कर बनाई गई पट्टियों को कपड़े की तरह बुनकर छबड़ी बनाई जाती है और इसे एक निश्चित आकार दिया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसका उपयोग रोटी या अन्य सामान रखने के लिए किया जाता है। इससे बने इन पात्रों पर रंगरोगन कर इन्हें और अधिक खूबसूरत बनाया जाता है। बागोड़ा गांव में तहसील के सामने निवासरत जोगी परिवार के मुखिया भीखाराम ने बताया कि पीढिय़ों से चली आ रही बांस की लकड़ी की कला लुप्त होने के कगार पर है। नई पीढ़ी ज्यादा मेहनत व कम आमदनी होने से इस पुश्तैनी धंधे से दूरी बना रही है। उन्होंने बताया है कि बांस की लकड़ी की उपलब्धता नहीं होने से इसमें लागत ज्यादा आ रही है।
प्लास्टिक ने रुलाया...
बांसफोड़ जाति के लोगों ने बताया कि आधुनिकता के इस दौर में मशीनीकरण के चलते घरों में अब बांस की छबड़ी की जगह प्लास्टिक से निर्मित बर्तनों ने ले ली है। जिससे लोगों का इस ओर मोह भंग हो रहा है। वहीं प्लास्टिक से बनी वस्तुएं भी सस्ती दर पर आसानी से मिल जाती है, जबकि बांस से बनी छबड़ी महंगी होती है।
कम हुई मांग
एक परिवार के मुखिया ने बताया कि पहले उनकी ओर से बनाई गई छबड़ी कि मांग स्थानीय क्षेत्र के अलावा शहरों में भी ज्यादा थी, लेकिन आधुनिकता के चलते अब इसकी मांग काफी घट गई है। ग्रामीण क्षेत्र के कुछ लोग ही इनका उपयोग करते हैं। जिस कारण पूरे परिवार को कड़ी मेहनत के बावजूद दो जून की रोटी का जुगाड़ करना भी मुश्किल हो गया है।





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