सुरेश लालवानी/अजमेर।
चलिए आज आठवें और नवें दशक की सैर करके आते हैं। मेरे कहने का मतलब है लगभग 1978 से लेकर 1995 के बीच की कुछ यादों का ताजा कर लेते है जो लगभग भूली बिसरी हो चुकी है। गले में सोने की चैन, चमकीली शर्ट के दो तीन खुले बटन, कलाई में सोने का बे्रसलेट, हाथ की उंगलियों में कुछ सोने की अंगूठियां। उस समय ताजा ताजा दुबई रिटर्न इस तरह के सिंधी लडक़े अजमेर के हर गली मोहल्ले में नजर आ जाते थे। घर के आर्थिक हालात उस समय भी कुछ खास अच्छे नहीं थे लेकिन दिखावा ऐसा कि मानो जेब में लाख रुपए और बैंकों में करोड़ो रुपए का बैलेंस हो चुका है।
बि सीटियल सदा यार सिंधी
सिंधी समाज के मशहूर संगीतकार और गायक मास्टर चंदर हुआ करते थे। अजमेर में प्रति वर्ष उनकी जयंती भी धूमधाम से मनाई जाती है। उन्होने अपने ही समाज के लोगों पर सटीक और शानदार गीत की रचना की जिसकी शुरुआत थी ‘ ’ सुञाईअ में बि सीटियल सदा यार सिंधी ‘ ’ । मौजूदा नौजवान शायद सुञाई और सीटियल का मतलब नहीं समझ पाए सो मैं समझा देता हूं। सुञाई के मायने है गरीबी और सीटियल का मतलब है अकड़। गीत का अर्थ था कि गरीबी के हालात में भी सिंधी लोग साधन सम्पन्न होने का भ्रम फैलाने में माहिर होते हैं।
युवकों ने ‘फॉरेन ’ की राह पकड़ ली
सही कहा था उन्होने। विभाजन के बाद लगभग 15-20 वर्ष तक तो सिंधी परिवारों में खाने तक के मांदे हो रखे थे। ताजा ताजा जवान हुई पीढ़ी को यह हालात रास नहीं आए। तब अचानक उनके सामने दुबई, मालद्वीप और सऊदी के विकल्प नजर आए और अधिकांश सिंधी युवकों ने ‘फॉरेन ’ की राह पकड़ ली। उस समय अधिकांश सिंधी परिवारों का कोई न कोई सदस्य फॉरेन (विदेश )में नौकरी करता था। अच्छी बात यह थी कि वहां जाते ही अपने यार दोस्तों और रिश्तेदारों के लिए भी कोई न कोई जुगाड़ बैठाकर उन्हें भी अपने पास बुला लेते थे।
नहीं हुए थे मोबाइल, कम्प्यूटर ईजाद
बात हो रही थी सिंधी समाज की गरीबी औऱ दिखावे की । दरअसल सिंध में रहने वाली हमारी पुरानी पीढ़ी काफी साधन संपन्न थी। जमा जमाया व्यापार, खेती बाड़ी के लिए जमीनें, अपने मकान, सोने चांदी के जेवर और नकद पैसा। कुल मिलाकर कोई कमी नहीं थी। हां मैं आपकी भावना समझ रहा हूं लेकिन कार, मोटरसाइकिल, टीवी, मोबाइल, कम्प्यूटर ईजाद नहीं हुए थे भाई। बड़े मॉल, रेस्तरां और आलीशान होटल भी नहीं थे। इसके मायने यह नहीं कि तब के लोग बिल्कुल गरीब थे। चित्रासिंह (जगजीत ) द्वारा गाई एक गजल की खूबसूरत लाइन है ‘ ’ यही है जिंदगी, कुछ ख्वाब चंद उम्मीदें ‘ ’ तो भाई हमारी पुरानी पीढ़ी के शानदार लोग इसी स्टाइल में जीते थे।
संस्कार बच्चों को भी दिए
जहां कल्पना से परे जाकर न तो ख्वाब देखे जाते थे और न ही असीमित ख्वाहिशें थी। शायद इसीलिए वे बहुत खुश और जिंदादिल हुआ करते थे। विभाजन के बाद उनसे यह सब छिन गया। महज एक दिन में ही वे खाली हाथ और कंगाल हो गए। शरणार्थी शिविरों में रहे, मजदूरी की, लेकिन किसी को एहसास नहीं होने दिया कि वे अपने परिवार सहित भूखे सो रहे हैं। हमेशा अच्छे दिनों का भ्रम फैलाए रखा। यही संस्कार उन्होने अपने बच्चों को भी दिए। आपको मालूम है दुबई पहुंचने वाले सिंधी लडक़ों का एक ही मकसद हुआ करता था।
खुले बटन, अंगूठियां दोस्त की पुरानी फटफटी
किसी तरह पैसे बचाकर दुबई मार्का सोने की चैन, ब्रेसलेट खरीद लिया जाए। दो साल की मुसाफिरी के बाद अजमेर आने के बाद उनके जलवे देखते ही बनते थे। वही जैसा कि ऊपर जिक्र किया था। सोने की चैन, खुले बटन, अंगूठियां पहनकर किसी दोस्त की पुरानी फटफटी यजदी, वेस्पा या बजाज स्कूटर लेकर शहर का एक चक्कर लगाकर खुद को रईस साबित करने का नाटक कर ही लेते थे। लोग भी उन्हें देखकर मन ही मन ईष्र्या करते थे कि जब यह शोरुम ही इतना चमचमा रहा है तो गोदाम में तो काफी माल होगा । लेकिन जनाब जो था बस वहीं था।
झपट्टा मारने का रिवाज नहीं
गोदाम याने घर के हालात तो तब भी अच्छे नहीं हुआ करते थे। एक बात अच्छी थी कि उस समय गले से चैन पर झपट्टा मारने का रिवाज नहीं था। अब उस समय शहर में सब एक दूसरे को नाम से नहीं तो शक्ल सूरत से तो जानते थे। झपटटा मारकर भागने के लिए तेज रफ्तार बाइक भी तो न हीं थी उस समय। इन हालातें में कैसे झपट्टा मार लेते।
मजबूरी में छोटी मोटी नौकरी
अब हालात बदल गए है । चैन स्नेचरों के आतंक और आयकर विभाग के डर से गले से मोटी मोटी सोने की चैन गायब हो गई है। महंगे जेवर है तो सही लेकिन वह बैंक के लाकर्स की शोभा बने हुए हैं। लेकिन दिखावे का नाटक तो आपको दिख ही जाता होगा। अब भी सिंधी समाज के अनेक लडक़े छोटी मोटी नौकरी कर रहे है लेकिन आपको एहसास नहीं होने देंगे कि वे किसी से कम है। उनका कोई न कोई दूर का रिश्तेदार, चाचा या मामा विदेशों में रहता होगा। उसे अपने पास बुलाने को बेताब है लेकिन क्या करें भाई यहां मम्मी पापा को कौन संभालेगा इस लिए मजबूरी में छोटी मोटी नौकरी कर रहे हैं। बाकी पैसे की कमी तो हमें है नहीं। विदेशो से रिश्तेदार प्रत्येक माह काफी पैसे बैंक में जमा करा देते हैं। कुल मिलाकर कुछ नहीं होते हुए भी उनके दिखावे का स्टाइल वैसा ही है जो सातवें आठवे दशक के युवाओं में था । मास्टर चंदर का वह गीत मौजूदा हालात में भी सटीक है।





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