नर्इ दिल्ली। अमरीकी फेडरल रिजर्व ने लगातार तीसरी बार ब्याज दरों में 25 बेसिस प्वाइंट कि बढ़ोतरी की है। इस बढ़ोतरी के साथ ही फेड रिजर्व ने ये भी संकेत दे दिया है कि जरूरत पड़ने पर वित्त वर्ष 2019 में आगे भी वो एेसा ही कर सकता है। ध्यान देने वाली बात है कि फेड रिजर्व ने ब्याज दरों में ये बढ़ोतरी तब किया है जब अमरीकी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में तेजी देखने को मिली है आैर अागे भी इसमें तेजी रहने के पुर्वानुमान हैं।
ब्याज दरों में बढ़ोतरी से दूसरी मुद्रआें के मुकाबले डाॅलर में होगी मजबूती
फेडरल रिजर्व द्वारा उठाए गए इस नीतिगत निर्णय से अमरीका समेत वैश्विक वित्तीय बाजार पर भी असर देखने को मिलेगा। यूएस फेड के चेयरेमैन जेरोम पाॅवेल ने इस बात काे भी स्वीकार किया है कि इस नीतिगत कार्रवार्इ से उभरते बाजारों पर दबाव देखने को मिल सकता है। लेकिन उन्होंने साथ में ये भी कहा कि एेसे किसी भी प्रभाव को बढ़ती अमरीकी तेजी से भरपार्इ किया जा सकता है। ब्याज दरों में इस बढ़ोतरी के बाद से उभरते बाजारों की मुद्रा अमरीकी डाॅलर की तुलना में आैर कमजोर होंगे। इसका असर भारतीय रुपए पर भी देखने को मिलेगा। रुपए में इस कमजोरी से आयात बिल आैर महंगे होंगे। इसका परिणाम राजकोषिय घाटे में बढ़ोतरी आैर मुद्रास्फिति में इजाफे के रूप में देखने को मिल सकती है।
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विदेशी निवेशकों पर पड़ेगा असर
अमरीकी डाॅलर के मुकाबले रुपए में इस कमजोरी से विदेशी निवेशकों को भी झटका लग सकता है। एेसे में यदि विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से माेहभंग होता है तो इसका उलटा असर भी अर्थव्यवस्था पर देखने को मिलेगा। भारत समेत उन देशों के लिए भी परेशानी खड़ी हो सकती है जो अपनी ग्रोथ के लिए विदेशी निवेशकों पर निर्भर रहते हैं। एेसा एक वाकया साल 1990 में एशियार्इ वित्तीय संकट के समय भी देखने को मिला था जब दक्षिण पूर्वी एशियार्इ देशों की मुद्रा में भारी गिरावट देखने को मिला था।
दूसरे देशों काे भी बढ़ानी पड़ सकती हैं ब्याज दरें
कर्इ उभरती अर्थव्यवस्थाएं कम ब्याज दरों का फायदा उठाकर अमरीका से डाॅलर में उधार लेती हैं। इस प्रकार वो अपनी ग्रोथ को बूस्ट करती हैं। जब अमरीकी ब्याज दर कम था तो इन अर्थव्यवस्थाअों की कर्इ कंपनियों ने भी डाॅलर में उधार लेकर अपने लोकल बाजारों में कर्ज का भुगतान किया था। एेसे में ब्याज दरों में बढ़ोतरी से उन्हें इसका फायदा नहीं मिलेगा। एशियन डेवलपमेंट बैंक ने भी कहा है कि ब्याज दरों में बढ़ोतरी से डाॅलर मजबूत होगा आैर इसके परिणामस्वरूप एशियार्इ कैपिटल में कमी देखने को मिलेगी। इससे उभरती अर्थव्यवस्थाएं भी अपनी मुद्रा को बचाने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी करेंगी। जो कि आगे चलकर वित्तीय अस्थिरता भी बढ़ा सकती है।





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