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विधानसभा कुंभलगढ़ : ‘4जी’ के जमाने में ‘२जी’ सी रेंग रही देहाती जिन्दगी

ग्राउंड जीरो ‘जन मन’ : कुंभलगढ़ (राजसमंद) लक्ष्मणसिंह राठौड़ की रिपोर्ट

आधुनिक युग में एक तरफ 4जी, 5जी की बातें हो रही है, तो दूसरी ओर कुंभलगढ़ विधानसभा के कई गांव और ढाणियों में जाना तो पैदल ही पड़ेगा, मगर ठीक से पगडंडी भी नहीं है। दीवारें छलांगते हुए, खेत किनारे की हदबंधी (पाली) से आवाजाही की मुख्य राह है। कई गांवों में नालियां तो क्या पेयजल का भी कोई प्रबंध नहीं है। आज भी लोग मीलों दूर पैदल माथे पर मटकी भर पानी लाने को मजबूर है। कुछ ऐसे ही हालात सोमवार को जन का मन टटोलने के लिए पनोतिया से आमेट, गोमती, चाभुजा, रिछेड़, थुरावड़ होकर गजपुर तक करीब 95 किमी. के सफर के दौरान गांव के लोगों ने बताए।

सोमवार सुबह ठीक 11 बजे अटल सेवा केंद्र पनोतिया के बाहर बैठे लोगों से पूछा गांव में क्या क्या समस्या है, तो धनोली के लालू गमेती बोले- पानी नहीं है। मोटर खराब, पाइप टूट गए, कोई सुध लेने वाला नहीं। सरकार स्वच्छता का ढोल पीट रही है, मगर हमारे यहां तो पीने का पानी ही नहीं है, तो शौचालय किस काम के। फिर देहाती में बोला-ठेकादार थूंक लगाइन कागज चपकावे जस्या संडास वणाया। फोरमलिटी कीदी। अबके चुनाव में बदलाव री हवा है, पण कनेइ मन में काई वात है, कोइ नी जाणे।

रेलवे क्रॉसिंंग का पार कर सीधे लावासरदारगढ़ बस स्टैंड पहुंचा, जहां चाय की गुमटी पर चुनाव की चर्चा छेड़ी, तो चाय बनाते हुए चतरपुरा (घोसुंडी) के माधुसिंह बोले- मैं 25 साल से वोट दे रहा हूं, मगर गांव का विकास करने वाला कोई नेता नहीं मिला। नेता सिर्फ चुनाव के वक्त या फीता काटने के दौरान ही दिखते हैं, तब केवल नेता बोलते हैं और जनता सुनती है। गांव की सडक़ इतनी ऊबड़ खाबड़ है कि प्रसूता को अस्पताल ले जाने से पहले ही जीप में ही कई प्रसव हो जाते हैं। मैं चाहता हूं बदलाव हो।

फिर 25 मिनट में विधायक सुरेन्द्र सिंह राठौड़ की गृह पंचायत आगरिया के सरदारपुरा पहुंचा, जहां विधवा लाड कुंवर बोली- तीन साल से ट्यूबवैल खराब है, पानी की व्यवस्था नहीं। गाय-भैंस को भी आधे किमी. दूर ले जाकर पिलाते हैं। तभी ओमा कुंवर बोली- मैंने 18 1 पर कॉल की, लिखित शिकायत के बाद भी समाधान नहीं हुआ। सडक़ आधी अधूरी है, व्हीकल भी मुश्किल से आते हैं। यहां से भगवानपुरा (काबरो मगरो) में स्कूल के बाहर सोलर पम्प से पानी भरने के लिए दर्जनभर महिलाएं चरू, मटकियों के साथ खड़ी व बैठी दिखी। मैंने परिचय देते हुए सवाल पूछा तो अणछीबाई बोली- ‘पाणी री घणी समस्या है, एक मटकी पानी रे वातरे दो-दो घंटा बैठो रेवणो पड़े।’, तभी सिर से चारे की गठरी उतार एक अन्य महिला बेबाक बोलते हुए पहुंची- अरे मैं वताऊ अणी गाम री समस्या। अबाणु खेतां में चारो- मक्की काटवा रा दन है, पण आदो दन दो मटकी पाणी भरवा री टेंशन में निकळ जावे। जमीं रो पणी ये माइंसा वाळा हुकाई दीदो। अटऊ कमाई कमाई ले जाइ रीया है, पण म्हाणे पाणी रो प्रबंध नी वेइ सक्यो। पाणी नी वेवाऊं छै-हात दन तक हापड़ी नी सकां। हापड़ा रे वातरे आदो को छैटी भील बस्ती में खारा पानी रो हैंडपंप है, वटे जावा। फिर नालियों के सवाल पर बोली- अरे साब म्हाणे गाम में नालियां नी छावे। नी तो पाणी, नी अतरो नावा-धोवा रो वे। भगवान! म्हाणे तो पाणी री व्यवस्था कराइ दो। गांव के बालूराम कुमावत ने भी पानी की ही समस्या बताई।

आमेट लक्ष्मी बाजार में कपड़ा व्यापारी से चुनाव की टोह ली, तो बोले- किसी भी पार्टी का नेता हो, चुनने के बाद कोई जनता की नहीं सुनता। नाम नहीं छापने की शर्त पर बोला- अब बदलाव तो होना ही चाहिए। विधायक चाहे भाजपा बने या कांगे्रस, मगर वरिष्ठ नहीं, अब युवा विधायक की जरूरत है। आधुनिकता की भ यही मांग है। खुद को वोराट का बताने वाले भूपेंद्र माहेश्वरी बोले- आज के नेता सिर्फ घर भरने में लगे है, जनता की कोई समस्या नहीं सुनता। आगे बढ़ा और चाम्पा का गुड़ा में बबूल की छांव में बैठे 6 0 वर्षीय छगु गुर्जर बोले- नेता आवता रेवे और जाता रेवे। कोई नेता घरे आइन खावा ने नी देवे। लेट्रींगा वणाई दीदी, पण काई जोगी नी। गोमती के एक स्थानीय टैक्सी चालक ने नाम बताए बगैर बोला- ये नेता बूरी बला है। हर कोई नहीं बोलता। गांव की समस्या बताना, मतलब नेता के खिलाफ होना। दूसरे ही दिन नेताजी का फोन आ जाएगा, वो भी समस्या समाधान के लिए नहीं, बल्कि यह कि मेरी शिकायत करता फिर रहा है। इसलिए मैं किसी पचड़े में नहीं फंसना चाहता। हां यह बात जरूर कहूंगा कि इस बार वोट पार्टी को देखकर नहीं, बल्कि चेहरे को देखकर ही दूंगा।

थुरावड़ पंचायत के नाथेला में किराणा दुकानदार रूप सिंह बोला- जिसे मेरा परिवार व गांव वोट देगा, उसे ही मैं वोट दूंगा। चाहे जीते या हारे। तभी शोभावतों का गुड़ा (अंटालिया) के लालसिंह खरवड़ बोले- मेरे गांव में पानी, नाली, सडक़ कोई सुविधा नहीं। गांव में कोई बीमार या डिलेवरी हो, तो उसे खाट पर सुलाकर सडक़ तक लाना ही एकमात्र विकल्प है। गांव में चौतरफा अतिक्रमण हो रहा है, मगर कोई नहीं सुनता।

रीछेड़ से गजपुर मार्ग पर काला पायरा में स्कूल के बाहर बैठी कुछ महिलाएं देखकर रूका। मोहनीबाई बोली- गांव में पानी की कोई सुविधा नहीं। नेटवर्क नहीं है, मोबाइल पर बात करनी हो, तो पहाड़ी पर चढऩा पड़ता है। पास में खेत पर गन्ने की सिंचाई कर रहे किसान चम्पा सिंह बोले- मैं बेहड़ाई रहता हूं, जहां सडक़ तो क्या पगडंडी भी नहीं है। खेतों में कूदते- छलांगते ही घर जाते हैं। विकास के नाम पर मेरे गांव में 25 साल पहले एक हैंडपंप खुदा है। पावणा गांव में सिर पर चारे की गठड़ी लेकर जाते अम्बासिंह ने पानी की समस्या बताई। इसके अलावा गांव के लोगों को नेताओं से कोई खास वास्ता नहीं है। क्योंकि विकास के नाम पर नेताओं ने सिर्फ गजपुर से रिछेड़ तक सडक़ बनी है। देश में लोग 4जी इंटरनेट की बात कर रहे हैं, मगर हमारे गांव के लोग तो मोबाइल पर बात भी नहीं कर पाते।



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