चिड़ावा (झुंझुनूं). मैं 93 बसंत देख चुका। इस दौरान राजनीति में अनेक उतार चढ़ाव आए। कभी दिन अच्छे रहे तो कभी खराब। पहले और अब के चुनाव में दिन रात का अंतर हो गया। हमारे जमाने में राजनीति सेवा हुआ करती थी, अब सुख सुविधाओं का लाभ लेने के लिए चुनाव लड़े जा रहे हैं। राजनीति में स्वच्छता जरूरी है। अब टिकट मिलना संभव नहीं है। फिर भी दिली इच्छा है कि कांग्रेस से टिकट मिल जाए तो एक बार पिलानी से चुनाव लडूं। इसके पीछे मकसद केवल राजनीति में स्वच्छता लाना है। यह कहना है स्वतंत्र पार्टी से चुनाव लडकऱ सूरजगढ़ से विधायक बने सूरजमल का।
सोलाना पंचायत के महरमपुर गांव निवासी पूर्व विधायक ने बताया कि वे 1967 से 1972 तक सूरजगढ़ से विधायक रहे। पांच साल में लोगों के बीच रहकर उनके दु:ख-दर्द दूर किए। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं रही तो चुनाव लडऩा भी छूट गया। पहले ऊंट-गाड़ी व पैदल ही प्रचार करते थे। कोई ज्यादा धूम-धड़ाका नहीं होता था। आज सब बदल गया और सब पैसे की माया हो गई।
पत्नी थी ताकत
14 साल की उम्र से आर्य समाज से जुड़ गया था। खूब भजन-भावों में गया। खुद विधायक बने तो पत्नी को उप सरपंच बनाया। मगर पत्नी का साथ छूटा तो जीवन अधूरा सा हो गया। पत्नीमेरी ताकत थी। बेटे हैं नहीं। बेटियां बोली, हमारे पास आ जाओ। मगर, बेटियों के घर नहीं गया। सडक़ किनारे ही करीब 30 बीघा जमीन है।
घर के पास ही बोरवेल बनवा रखा है। जिसके पानी से खुद ही खेत सींचते हैं। इस बार बाजरा, मूंग व ग्वार लगा रखा है। किसानी कर रहे पूर्व विधायक सूरजमल कहने लगे, इस बार फसल ठीक-ठाक है। ज्यादा कमाई भी किस काम की। घर चल जाए इतना ही काफी है।
ना कार ना बैंक बैलेंस
विधायकों के पास जहां चमचमाती कार व महंगे बंगले हैं, वहीं पूर्व विधायक सूरजमल इनसे कोसों दूर हैं। कहने लगे, किसी से एक रुपया लिया नहीं। आमदनी कहां से हो। खेती-बाड़ी हो जाती है और पेंशन मिल जाती है। जिससे काम चल जाता है। दूसरी जगह जाना हो तो बस से चले जाते हैं। घर में झाडू लगाने व अन्य कार्य खुद करते हैं।
पेड़-पौधों की सार-संभाल सहित अन्य कार्य स्वयं करते हैं।





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