घाणेराव. कुंभलगढ़ वन्य जीव अभ्यारण्य में स्थित ठंडी बेरी बंाध से आदिवासी किसानों को रबी फसलों की सिंचाई के लिए नि:शुल्क पानी मिलता है। इस बार ठंडीबेरी बांध में पानी की आवक नहीं होने के कारण इस बार आदिवासी किसानों को रबी की फसलों की सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल पाएगा। उल्लेखनीय है कि ठंडी बेरी बांध क्षेत्र के किसानों ने पहाडिय़ों को काटकर अपने खेतों से बांध का पानी पहुंचाया था।
अभयारण्य में स्थित श्रीमुछाला महावीर गरासिया कॉलोनी में करीब सौ से अधिक परिवार कृषि भूमि पर खेती कर अपना जीवन व्यापन वर्षों से कर रहे हैं। गरासिया कॉलोनी से मात्र दो कि लोमीटर दूर पर स्थित अभ्यारण्य में एक ठंडी बेरी बांध है। इस बांध से करीब 25 वर्ष पूर्व इन आदिवासी लोगों ने दिन रात मेहनत कर तीन नहरों को विकसित किया था। मगर तीन में से दो नहरों में पानी ऊपर नहीं चढऩे के कारण नाकारा हो गई। एक नहर में इन लोगों को उम्मीद थी कि पानी उनके खेतों तक पहुंच जाएगा। ऐसे में उन्होंने पहाडियों को काटकर पानी को नहर के माध्यम से खेतों में पहुंचाया। इसके बाद लगातार यह लोगों इस नहर के माध्यम से खेती करते आ रहे हैं। मगर हर बार बरसात के मौसम में तीन किलोमीटर लम्बी और पहाड़ी के ऊपर बनी कच्ची नहर अधिक बरसात के कारण जगह-जगह से क्षतिग्रस्त हो जाती है। इसके कारण आदिवासी लोग नहर की मिलकर मरम्मत करते हैं। जिससे सभी किसानों को पानी मिल सके। इस बार अभ्यारण्य में हुई कम बरसात के कारण ठंडीबेरी में पानी की आवक नहीं हुई। जबकि वन विभाग द्वारा ठंडीबेरी के ओरवरफ्लो चलने तक पानी को सिंचाई के लिए आदिवासी किसानों को नि:शुल्क दिया जाता है। ठंडीबेरी में पानी की आवक बंद होते ही किसानों को पानी की सप्लाई बंद कर दी जाती है। ठंडीबेरी बांध अभयारण्य में होने के कारण करीब तीन से चार माह तक ओवरफ्लो होता है। इसके कारण आदिवासी किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिल जाता है। इससे हर वर्ष रबी फसलों में अच्छी पैदावर होती है।
नहर बनाने में लगे थे दस वर्ष
ठेरी बेरी बांध के पानी को अपने खेतों में लाने के लिए आदिवासी लोगों को पहाड़ी के अन्दर होते हुए नहर का निर्माण करना था। ऐसे में एक नहर का इन लोगों पहाड़ी में निर्माण कर दिया, मगर उसमें सफलता नहीं मिली। ऐसे में पहाड़ी के निचले भाग से दूसरी नहर का निर्माण किया। मगर उसमें भी नहर सफल नहीं हो सकी। आदिवासी लोगों ने पहाड़ को काटकर तीसरी नहर का निर्माण किया, तब जाकर उन्हें सफलता मिली। इन लोगों को बांध से तीन किलोमीटर दूर खेतों तक नहर बनाने में दस वर्ष लग गए थे।
बारिश में नहर हो जाती है क्षतिग्रस्त
पहाडिय़ों के बीचोंबीच से गुजर रही ठडी बेरी बांध से नहर बरसात के कारण क्षतिग्रस्त हो जाती है। कई जगह से पत्थर बहकर चले गए। तीन किलोमीटर नहर को दुरुस्त करने में आदिवासी लोगों को पन्द्रह दिन तक दिन भर काम कर उसको तैयार करते हैं। मगर इस बार बांध में पानी नहीं होने के कारण नहर की मरम्मत नहीं हो पाई।
400 बीघा भूमि पर नहीं होगी सिंचाई
आदिवासी लोगों के पास पांच से छह बीघा कृषि भूमि है। इस भूमि पर यह लोग खेती करते हैं। ऐसे में सिंचाई के लिए आदिवासी लोगों ने तीन किलोमीटर क्षतिग्रस्त कच्ची नहर को दुरुस्त कर ठंडीबेरी बांध से पानी को लाते हैं। इस बार ठंडीबेरी बांध में पानी की आवक नहीं होने के कारण 400 बीघा भूमि पर सिंचाई नहीं हो पाएगी।
ठंडीबेरी में नही हुई पानी की आवक
अभयारण्य में स्थित ठंडीबेरी में पानी आवक होने पर अािदवासी किसानों को सिंचाई के लिए हर वर्ष पानी दिया जाता है। इस बार कम बरसात होने के कारण पानी की आवक ठंडीबेरी में नही होने के कारण सिंचाई के लिए पानी नहीं दिया जाएगा।
मूलाराम कुमावत, प्रभारी, वन चौकी, घाणेराव





No comments:
Post a Comment