मुकेश शर्मा कोटा. एसीबी को भ्रष्टाचारियों के खिलाफ संबंधित विभाग से अभियोजन स्वीकृति नहीं मिलने, भ्रष्टाचारियों के लिए जांच में दस्तावेज जुटाने में संबंधित विभाग का सहयोग नहीं देने से मामलों की जांच वर्षों तक पूरी नहीं हो रही। इस पर एसीबी में जांच अधिकारियों के टोटे के चलते भ्रष्टाचारियों के लिए हालात पांचों अंगुलियां घी में और सिर कढ़ाई में जैसे हो गए हैं।
जांच अधिकारियों की कमी
एसीबी सूत्रों ने बताया कि एसीबी के पास पूरे राज्य में कर्मचारियों व अधिकारियों की कमी है। ऐसे में ब्यूरो के पास अंगुलियों पर गिनती के जांच अधिकारी हैं। इससे मामलों की जांच लम्बे समय तक नहीं हो पाती। कोटा में यूं तो एसीबी में एसपी व दो एएसपी तैनात हैं, लेकिन मामलों की जांच के लिए दोनों एएसपी व दो निरीक्षक समेत कुल चार अधिकारियों के पास ही अधिकार है।
शुरू तक नहीं हो पाती जांच
एसीबी में जांच अधिकारियों की कमी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रकरण दर्ज होने के बाद अधिकांश में वर्षों तक जांच तक शुरू नहीं हो पाती। एसीबी अधिकारियों को पुराने मामलों के निस्तारण में अपना अधिकांश समय लगाना पड़ता है। वर्तमान में एसीबी में औसतन करीब चार वर्ष पुराने मामलों में जांच गति पकड़ पा रही है।
नहीं मिलती अभियोजन स्वीकृति
एसीबी की ओर से अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ दर्ज प्रकरणों में जांच के बाद उन्हें संबंधित अधिकारी या कर्मचारी के विभाग के आला अधिकारियों से अभियोजन स्वीकृति लेनी पड़ती है, लेकिन विभाग से अभियोजन स्वीकृति आसानी से नहीं मिलती। इसके चलते भी कई मामले वर्षों से अभियोजन स्वीकृति के अभाव में ही अटके रहते हैं। कई बार तो चार से पांच रिमांडर (स्मरण पत्र) भेजने के बाद स्वीकृति मिलती है। ऐसे में लम्बा समय गुजर जाता है। कई मामलों में इस प्रकिया में एक दशक तक का समय लग जाता है। ऐसे करीब 25 फीसदी मामलों में लंबा समय खिंच जाता है।
दस्तावेज जुटाना टेढ़ी खीर
पद के दुरुपयोग के मामलों में एसीबी को मामले से जुड़े दस्तावेज जुटाने होते हैं, लेकिन विभाग की ओर से एसीबी को इस मामले में पूरा सहयोग नहीं मिल पाता। कई बार अधिकारी जांच में लगने वाले समय में दस्तावेज ही नष्ट कर देते हैं। ऐसे में मामलों को साबित करने में भारी परेशानी होती है। कई बार तो दस्तावेजों की जांच के लिए अधिकारियों को विभाग के सैकड़ों फेरे लगाने पड़ते हैं। इससे जांच वर्षों तक पूरी नहीं होती। इससे लगभग 80 फीसदी मामलों में चालान पेश करने में एक दशक से अधिक का समय लग जाता है।
केस : एक
17 वर्ष बीते, एक आरोपी की मौत, फिर भी चालान शेष
पद के दुरुपयोग के मामले में वर्ष 2001 में चिकित्सालय अधीक्षक व राजस्थान मेडिकल रिलीफ सोसायटी के सदस्य सचिव डॉ. पीसी गुप्ता, निश्चेतना विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. आरएस शर्मा, सहायक लेखाकार विजय कुमार शर्मा व बंसल मेडिकल स्टोर के संचालन बृजेन्द्र कुमार बंसल के खिलाफ पद के दुरुपयोग का मामला दर्ज हुआ, लेकिन अभी भी मामला पेडिंग चल रहा है। मामले में निश्चेतना विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. आरएस शर्मा की तो निर्णय के इंतजार में मृत्यु ही हो गई।
केस : दो
आठ वर्ष बीते, मामला एसीबी मुख्यालय में पेडिंग
पद के दुरुपयोग के मामले में रीको के योजना सहायक बलविन्दर कवात्रा के खिलाफ वर्ष 2010 में मामला दर्ज हुआ, लेकिन 8 वर्ष बीतने के बावजूद अभी यह मामला ब्यूरो के मुख्यालय में ही पेडिंग पड़ा है।
केस : तीन
लिपिक के खिलाफ विभाग नहीं दे रहा अभियोजन स्वीकृति
पद के दुरुपयोग के मामले में यूआईटी के वरिष्ठ लिपिक के खिलाफ वर्ष 2012 में दर्ज हुए मामले में स्वायत्त शासन विभाग से अभियोजन स्वीकृति नहीं मिलने से मामला जहां का तहां है।
केस : चार
पांच वर्ष बीते, कलक्टर ने नहीं दी अभियोजन स्वीकृति
रामगंजमंडी उपखंड अधिकारी के प्रथम श्रेणी लिपिक ईश्वर सिंह के खिलाफ 2015 में दर्ज रिश्वत की शिकायत के मामले में जिला कलक्टर कार्यालय से अभियोजन स्वीकृति नहीं मिल रही। इसके चलते एसीबी इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं कर पा रही।
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एसीबी की कार्रवाई करने की एक प्रकिया है। हमें इसके तहत ही कार्रवाई करनी होती है। तमाम प्रकार के सबूतों को जुटाने में काफी समय लगता है। हम प्रकिया को फॉलो कर अधिक से अधिक मामलों के निस्तारण का प्रयास कर रहे हैं। जिन मामलों में अभियोजन स्वीकृति अटकी है, वहां स्मरण पत्र भेजा जाता है। अधिकारियों की कमी से जांच में समय लग जाता है।
- डॉ. किरण कंग,
पुलिस अधीक्षक, एसीबी, कोटा





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