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प्रेम का संदेश लेकर आए ये प्रवासी पक्षी


महाजन. जहां एक और इंसान धर्म, मजहब, भाषा और क्षेत्र के नाम पर जमीनें तकसीम कर सरहदें खींच रहा है वहीं दूसरी ओर इन सबसे बेखबर प्यार का संदेशा लिए प्रवासी परिंदे कुरजां हजारों किलोमीटर का सफर तय कर इन दिनों उपखंड क्षेत्र लूणकरणसर के महाजन सहित विभिन्न गांवों के जलस्रोतों के पास डेरा डाले हुए है। प्रदेशी मिट्टी के जन्में ये पक्षी सितम्बर-अक्टूबर माह में आना शुरू करते और फरवरी तक शीतकाल के समय यहां जमे रहते है।

 

राजस्थानी गीतों में बड़े लाडकोड से गाये जाने वाले साइबेरियन क्रेन को स्थानीय भाषा में कुरजां कहकर पुकारा जाता है। विरहणियों की सखी के रूप में पहचान पाने वाले कुरजां को बेहतरीन संदेश वाहक माना जाता है। 'कुरजां म्हारी हालो नी आलीजा रे देश' और 'कुरजां म्हारी भंवर मिला दै ऐ' जैसे राजस्थानी गीत विरहणी की पीड़ा को बड़ी शिद्धत के साथ बयां करते हैं। अनुशासन में उडऩे वाले साइबेरियन सारस इन दिनों उपखण्ड के लूनकरणसर, महाजन, जैतपुर सहित क्षेत्र के विभिन्न तालाबों व बावडिय़ों के इर्द-गिर्द अपने आपको महफूज पाते हैं। सैंकड़ों की तादाद में उपखण्ड क्षेत्र में उड़ान भरते प्रदेशी पावणंै आजकल लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र बने हुए है।

 

साइबेरियन क्रेन या कुरजां शीतकाल का समय राजस्थान के विभिन्न हिस्सों में गुजारते है। विशेषकर लूनकरणसर में। यह उनके प्रजनन का समय रहता है। लूनकरणसर क्षेत्र को इसके लिए कुरजां सुरक्षित मानता है।
राजूराम बिजारणियां, युवा साहित्यकार



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